Author Topic: भिकारी  (Read 376 times)

Offline Asu@16

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भिकारी
« on: October 15, 2017, 07:16:59 PM »
       भिकारी

मानवतेचा मी पुजारी
        भीक मागतो दारोदारी
मानवता हो कुठे बुडाली ?
         दिसेना मजला क्षणभरी
मंदिरात जरि असल्या मूर्ती
         कोण त्यांना देईल स्फूर्ती
शेंदुर फासुन पावन झाले
         गंगेत जसे घोडे न्हाले
शोधित फिरलो शहरो शहरी
         घरी - दारी, गिरी - कंदरी
मन आतुरले, पडतो खुजा
         कशी करू मी मानव - पूजा
वण वण फिरुनी थकलो भारी
         तोच भेटला एक भिकारी
घास देऊनि वदला मजला
          खाऊन घेई, कृपा करी
हात जोडुनि हो माघारी
          मानवतेचा मी पुजारी

- अरूण सु.पाटील
(प्रभुकृपा गणराज्य दिन विशेषांक १९८५ मध्ये प्रसिद्ध)

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