Author Topic: होशियारी मोहताज हैं दिन के उजाले की!  (Read 341 times)

Offline Shraddha R. Chandangir

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ख़ुमारी हैं तब तक,  होठों से लगाना हैं
बाद फिर सिगरेट को, कुचला ही जाना हैं।

होशियारी मोहताज हैं, दिन के उजाले की
रात की आग़ोश में, हर शख़्स  दिवाना हैं।

इसलिए  भी उसको, ख़्वाहिश  हैं पाने की
की कुछ तो हो ऐसा, जो हँस के गवाना हैं।

उससे नराज़गी भी, इक चालाकी हैं मिरी
उसके तरीक़े से मुझे, उसी को मनाना हैं।
~ श्रद्धा

Marathi Kavita : मराठी कविता


Offline कवि - विजय सुर्यवंशी.

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  • सई तुझं लाघवी हसणं अजुनही मला वेड लावतं.....
आपको पढकर.. गझल से रुबरु हो गये.... keep it up