Author Topic: उपकार  (Read 598 times)

Offline ajeetsrivastav

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उपकार
« on: February 10, 2016, 09:38:54 PM »
आज सत्य होता है झूठ
और न्याय को भे मिलती है मात
कलुष की होती है सिद्धि
सत्य को ही मिलती है घात
सबको देता छाया सीतल
फिर जलता क्यू है वही  पात
रात्रि को देता है दृष्टि
बुझता दीपक है वह प्रभात
महलो वालो का क्या जाता
छप्पर तोड़ती है बरसात
भवन तो रहते जस के तस
कुटी बहाती जल प्रपात
मुट्ठी भर धरती के खातिर
होता रहता है रक्तपात
मनोरंजन आखेट है क्यू
मानव करता है जीवघात
जो स्वेद बहाता है किसान
उजड़ा है उसका घर दिहात
क्या यही सत्य है जीवन का
कीचड में रहता है जलजात
बदलो इन पंकिल नियमो को
जग पालन हारी विस्वनाथ
इसी प्राथना को लेकर
 आज उठे है मेरे हाथ ।।
बच्चा अबोध है जो अब तक
मर जाते क्यू उनके भी तात
क्या पाप कभी करता है वो
हो जाता है फिर क्यूँ अनाथ
बच्चे मरते फिर ठंढक से
स्वानों को मिल जाते है नाथ
उनको कब मिलता है कोई
जिन्हें चाहिए सच में साथ
तरुणाई करती है अविनय
जब मेहनत करती वृद्ध गात
जीवन भर फल देता जो तरु
क्यू उन्हें गिराती तेज़ वात
आज जगत में होता क्यू
इतना ही ज्यादा पक्षपात
मानव करता मानव से भेद
सदा पूछता क्या है जात
तू तो समदर्शी  ही है
क्या तुझे नहीं है फिर ये ज्ञात
कहा छुपे हो हे ईश्वर
इनपर भी कर दो दृष्टीपात
सबकी सुनते हो कहते सब
मेरी भी सुन लो यही बात
करता हु मै तुमको अर्पित
अपना यह सबकुछ यह और गात
बस चाहू मै इसके बदले
दे दो फिर से निर्बल का साथ
कर दो इनपर उपकार प्रभु
 जग पालन हारी विस्वनाथ
इसी प्राथना को लेकर
 आज उठे है मेरे हाथ ।।

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