Author Topic: ढ़ीठ चाँदनी  (Read 340 times)

Offline dhanaji

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ढ़ीठ चाँदनी
« on: February 15, 2016, 11:59:32 AM »

ढ़ीठ चाँदनी
आज-कल तमाम रात
चाँदनी जगाती है
मुँह पर दे-दे छींटे
अधखुले झरोखे से
अन्दर आ जाती है
दबे पाँव धोखे से
माथा छू
निंदिया उचटाती है
बाहर ले जाती है
घंटो बतियाती है
ठंडी-ठंडी छत पर
लिपट-लिपट जाती है
विह्वल मदमाती है
बावरिया बिना बात?
आजकल तमाम रात
चाँदनी जगाती है
- डॉ. धर्मवीर भारती

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