Author Topic: खुद को आज़माने की भी कग़ार पे आना हैं मुझे।  (Read 162 times)

Offline Shraddha R. Chandangir

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दुनिया में दुनियादारी के, बाज़ार में आना हैं मुझे
खुद को आज़माने की भी कग़ार पे आना हैं मुझे।
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मेरा नारा हैं की काग़ज़ो में अब, पेड़ ज़ाया न हो
हालाँकि इन सुर्खियों से अख़बार में आना हैं मुझे।
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बिमार माँ को चंद माह से, यहीं दिलासा दिया हैं
जरा रुको की घर तो अब त्योहार में आना हैं मुझे।
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तमाम उम्र गुज़ारी मैंने, काँटो की चुभन गिनने में
फूल देने  के लिए उसकी, मज़ार पे आना हैं मुझे।
~ श्रद्धा

Marathi Kavita : मराठी कविता


 

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