Author Topic: * कली *  (Read 242 times)

Offline कवी-गणेश साळुंखे

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* कली *
« on: November 02, 2015, 10:44:00 PM »
रो रही थी हर कली चमनमें
कोई पैरोतले फूलोंको रौंद गया था
किस बात की सजा मिली थी उन्हें
क्या खिलना ही बस उनका गुनाह था.
कवी- गणेश साळुंखे.
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