Author Topic: स्थितप्रद्न्य  (Read 628 times)

Offline kumudini

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स्थितप्रद्न्य
« on: May 01, 2013, 03:50:08 PM »
     

स्थितप्रद्न्य  हा  उभा  ठाकला 

द्याया  छाया  विश्वाला

भला  बुरा  तो  न  जाणतो

एकच  छाया  सकला  देतो

संथ  वाहते  शीतल  सरिता 

भेदाभेदा  नच मानीता

तृष्णा   शामविते   तृषार्त  येता

पालन  करूनी  निजधर्माला

निसर्ग  पाळी  स्वधर्म  आपुला

मानव  सगळे  विसरून  गेला

जाग  माणसा   जाग  आतातरी

स्वधर्मास   तू पाळायला

                                             कुमुदिनी काळीकर

Marathi Kavita : मराठी कविता


Offline केदार मेहेंदळे

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  • मला कविता शिकयाचीय ...
Re: स्थितप्रद्न्य
« Reply #1 on: May 02, 2013, 11:21:31 AM »
chan kavita

Offline विक्रांत

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Re: स्थितप्रद्न्य
« Reply #2 on: May 02, 2013, 02:59:26 PM »
good ,

Offline मिलिंद कुंभारे

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  • ती गेली तेव्हा रिमझिम पाऊस निनादत होता!
Re: स्थितप्रद्न्य
« Reply #3 on: May 03, 2013, 11:34:38 AM »
निसर्ग  पाळी  स्वधर्म  आपुला

मानव  सगळे  विसरून  गेला

छान !!!!!