Author Topic: काळोखभिलाषा  (Read 886 times)

Offline विक्रांत

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काळोखभिलाषा
« on: November 09, 2013, 06:21:12 PM »

त्या तुझ्या वचनामुळे
अजून आहे जगतो
अन्यथा जमा काळोखी 
केव्हाच झालो असतो

अजूनही काळोख तो
आहे मज खुणावतो
शांत काळा खोल डोह
जीवास भूल घालतो

पोटासाठी देह जरी 
फरफटत ओढतो
खिळखिळलीय नाती
तरीही बळे जगतो

येई आता तूच माझा
काळोख प्रिय होवून
जगण्या मरण्यातला
भेद जावू दे मिटून

विक्रांत प्रभाकर

« Last Edit: April 19, 2014, 12:43:17 AM by MK ADMIN »

Marathi Kavita : मराठी कविता


Jawahar Doshi

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Re: काळोखभिलाषा
« Reply #1 on: November 17, 2013, 02:17:45 AM »
Sundar... Sundar.. Sundar. Can you contact me on my email?

Offline विक्रांत

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Re: काळोखभिलाषा
« Reply #2 on: November 18, 2013, 03:19:08 PM »
thanks Jawahar.
Why not sure . pl.let me know it.