Author Topic: क्षितिज  (Read 621 times)

Offline madhura

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क्षितिज
« on: February 09, 2016, 12:11:55 PM »

क्षितिज में ये सूरज का मंज़र तो देखो
ज़मीं आसमां का स्वयंवर तो देखो
घना मेघ बढ़ता चला आ रहा है
फतह करने निकला सिकंदर तो देखो
महक सूंघती है घने गेसुओं की
अजी इस हवा का मुक़द्दर तो देखो
बड़ी खूबसूरत लगेगी ये दुनिया
लिबासे मुहब्बत पहनकर तो देखो
ये लगता है जैसे अभी हँस पड़ेंगे
तराशे हुए संगेमरमर तो देखो
जो बूंदों ने चूमा ज़मीं के बदन को
सुगंधों के खुलते हुए पर तो देखो
ज़मीं लाल पीली हँसी हँस रही है
हरी कोंपलों के उठे सर तो देखो
अलग दास्ताँ है सुगम ज़िंदगी की
कभी उसकी महफ़िल में आकर तो देखो.

By Ramnath Jaiswal

Marathi Kavita : मराठी कविता


 

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