Author Topic: चाह कर भी चुप चाप हूं  (Read 754 times)

Offline janki.das

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चाह कर भी चुप चाप हूं
« on: February 17, 2016, 11:24:56 AM »

चाह कर भी चुप चाप हूं
कुछ कहने की चाहत है
पर खामोश हूं
बातें करता हूं इस दिल से
कोई साथ नही
इसलिए अपने साथ हूं
सहारा तो नही ढूनडता
पर सहारे की चाह है
तन्हाई से दोस्ती हो गयी
और अपने आप से भी
पर कभी कभी
रोशनी की तलाश है
सोचता हूं एक दिन
मंज़िलो की आस में
मिलूँगा उनसे भी कभी
इस ख्वाब के साथ
चल पड़ा हूं आज फिर
रात काटने की बात है
फिर वही सवेरा
और फिर वही रात है ...
फिर वही सवेरा
और फिर वही रात है ....


-- unknown

Marathi Kavita : मराठी कविता

चाह कर भी चुप चाप हूं
« on: February 17, 2016, 11:24:56 AM »

 

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