स्कूली शिक्षा और उसकी कठिनाइयाँ-1

Started by Atul Kaviraje, December 09, 2024, 05:04:19 PM

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Atul Kaviraje

स्कूली शिक्षा और उसकी कठिनाइयाँ-

हिंदी उदाहरण सहित सम्पूर्ण और विवेचनपर विस्तृत और प्रदीर्घ लेख-

प्रस्तावना:
स्कूली शिक्षा किसी भी राष्ट्र के समाज के विकास का आधार होती है। यह न केवल बच्चों के बौद्धिक विकास का एक माध्यम है, बल्कि यह उन्हें सामाजिक, मानसिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी मजबूत बनाती है। शिक्षा समाज के प्रत्येक वर्ग और समुदाय के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण होती है। जब शिक्षा का सही तरीके से वितरण किया जाता है, तो यह राष्ट्र के समग्र विकास में सहायक सिद्ध होती है। लेकिन इसके रास्ते में कई कठिनाइयाँ भी आती हैं, जिनका सामना विद्यार्थियों, शिक्षकों और शिक्षा प्रणाली के अन्य घटकों को करना पड़ता है।

स्कूली शिक्षा का महत्व:
स्कूली शिक्षा का महत्व समाज और राष्ट्र के विकास में अभूतपूर्व होता है। यह बच्चों को बुनियादी ज्ञान, जैसे कि पढ़ाई, लिखाई, गणित, विज्ञान और सामाजिक अध्ययन प्रदान करता है, जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी मदद करता है। इसके अलावा, शिक्षा उन्हें नैतिक और सामाजिक मूल्यों से परिचित कराती है, ताकि वे एक जिम्मेदार नागरिक बन सकें।

उदाहरण के लिए, किसी भी छात्र का शालेय जीवन उसे आत्मविश्वास, समय प्रबंधन, और सामाजिक कौशल सिखाता है। शिक्षा के जरिए ही छात्र जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान खोजने में सक्षम होते हैं और उन्हें समाज में अपने कर्तव्यों का अहसास होता है।

स्कूली शिक्षा की कठिनाइयाँ:
हालाँकि, स्कूली शिक्षा का उद्देश्य बहुत ही आदर्श और महत्वपूर्ण होता है, लेकिन कई स्थानों पर इस उद्देश्य की प्राप्ति में बहुत सारी कठिनाइयाँ आती हैं। इन कठिनाइयों का विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक है ताकि हम उन्हें दूर कर सकें और बच्चों को एक बेहतर शैक्षिक वातावरण प्रदान कर सकें।

शिक्षकों की कमी और उनकी गुणवत्ता: भारत जैसे विकासशील देश में शिक्षा प्रणाली में सबसे बड़ी कठिनाई शिक्षकों की कमी और उनकी गुणवत्ता का मुद्दा है। कई स्कूलों में पर्याप्त संख्या में शिक्षक नहीं होते हैं, और जिनमें होते भी हैं, उनमें से कुछ की शिक्षा की गुणवत्ता और प्रशिक्षण कमजोर होता है। यह समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से अधिक देखने को मिलती है। शिक्षक की गुणवत्ता बच्चों की शिक्षा पर प्रत्यक्ष असर डालती है।

उदाहरण के तौर पर, अगर किसी स्कूल में गणित या विज्ञान के अच्छे शिक्षक नहीं हैं, तो बच्चों को इन विषयों में सही तरीके से समझ नहीं आता, जिससे उनका बौद्धिक विकास प्रभावित होता है।

आर्थिक कठिनाइयाँ और शैक्षिक खर्च: शालेय शिक्षा का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए एक गंभीर समस्या है। गरीब परिवारों के लिए अपने बच्चों को स्कूल भेजना एक भारी वित्तीय बोझ हो सकता है। स्कूल की फीस, पुस्तकें, यूनिफॉर्म, परिवहन आदि के खर्चे बच्चों के माता-पिता पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। इसके कारण कई परिवार अपने बच्चों को स्कूल भेजने से कतराते हैं।

उदाहरण के तौर पर, एक छोटे से गाँव में रहने वाला बच्चा जिनके माता-पिता गरीब हैं, वह शहर के स्कूल में प्रवेश लेने की सोचता है, लेकिन स्कूल की उच्च फीस और यात्रा के खर्चे उसे शिक्षा से वंचित रखते हैं।

शालेय सुविधाओं की कमी: शालाओं में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी एक बड़ी कठिनाई है। शाला में पर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर न होना, जैसे शौचालय, पंखे, पानी की सुविधा, उचित बैठने की व्यवस्था, और कंप्यूटर जैसे आधुनिक संसाधनों की कमी, बच्चों के शिक्षा अनुभव को बहुत प्रभावित करती है।

उदाहरण स्वरूप, कई ग्रामीण स्कूलों में न तो अच्छी विज्ञान प्रयोगशाला है और न ही कंप्यूटर लैब। इसके कारण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई होती है, विशेष रूप से विज्ञान और गणित जैसे विषयों में।

मानसिक दबाव और परीक्षा का बोझ: भारतीय शिक्षा प्रणाली में अक्सर विद्यार्थियों पर भारी परीक्षा दबाव रहता है। उन्हें बोर्ड परीक्षा जैसी बड़ी परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए अत्यधिक दबाव में रखा जाता है। यह मानसिक तनाव को बढ़ाता है, जिससे बच्चों की मानसिक सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

उदाहरण के तौर पर, कक्षा 10 और कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षा के परिणाम पर छात्र के भविष्य का निर्धारण किया जाता है, जिससे बच्चे बहुत अधिक तनाव और चिंता का सामना करते हैं। इस तनाव का परिणाम बच्चों की शारीरिक और मानसिक सेहत पर नकारात्मक रूप से होता है।

--संकलन
--अतुल परब
--दिनांक-09.12.2024-सोमवार.
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