स्कूली शिक्षा और उसकी कठिनाइयाँ-2

Started by Atul Kaviraje, December 09, 2024, 05:04:48 PM

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Atul Kaviraje

स्कूली शिक्षा और उसकी कठिनाइयाँ-

हिंदी उदाहरण सहित सम्पूर्ण और विवेचनपर विस्तृत और प्रदीर्घ लेख-

लिंगभेद और जातिवाद: शिक्षा में लिंगभेद और जातिवाद जैसी सामाजिक समस्याएँ भी सामने आती हैं। ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने में विशेष चुनौतियाँ आती हैं। इसके अलावा, जातिवाद के कारण कुछ विद्यार्थियों को शालेय वातावरण में भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

उदाहरण के तौर पर, कुछ गाँवों में लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने की छूट नहीं होती, क्योंकि वहाँ पर पारंपरिक धारा है जो लड़कियों को घर के कामों में ही व्यस्त रखती है। इससे उनकी शिक्षा का स्तर प्रभावित होता है।

अपर्याप्त पाठ्यक्रम और सिलेबस: पाठ्यक्रम और सिलेबस भी कभी-कभी छात्रों के लिए जटिल होते हैं, और वे इसको समझने में सक्षम नहीं हो पाते। पाठ्यक्रम को बच्चों की समझ के अनुरूप सरल और व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता है।

उदाहरण के तौर पर, कुछ विषयों का सिलेबस इतना अधिक होता है कि छात्र इसे पूरा करने के लिए पर्याप्त समय नहीं पाते और अंत में परीक्षा में असफल हो जाते हैं।

समाधान और सुधार के उपाय:
शिक्षकों के प्रशिक्षण में सुधार: शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए सबसे पहले शिक्षकों की गुणवत्ता और प्रशिक्षण में सुधार करना आवश्यक है। शिक्षक-शिक्षिका को समय-समय पर प्रशिक्षित करना चाहिए ताकि वे नए तरीकों और आधुनिक तकनीकी उपायों से शिक्षा दे सकें।

आर्थिक सहायता और शिष्यवृत्तियाँ: गरीब परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा पर खर्च कम करने के लिए सरकार को शिष्यवृत्तियाँ और आर्थिक सहायता प्रदान करनी चाहिए ताकि वे अपना शिक्षा जारी रख सकें।

शालेय सुविधाओं की वृद्धि: स्कूलों में बुनियादी सुविधाएँ जैसे शौचालय, पेयजल, पंखे, सफाई आदि की व्यवस्था सुनिश्चित करना चाहिए ताकि बच्चों को एक सुरक्षित और आरामदायक वातावरण मिल सके।

मानसिक दबाव कम करना: छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए परीक्षा प्रणाली में सुधार किया जा सकता है। बोर्ड परीक्षाओं के दबाव को कम करने के लिए वैकल्पिक मूल्यांकन पद्धतियों को अपनाना चाहिए।

लिंग समानता और जातिवाद से मुक्ति: स्कूलों में लिंग समानता और जातिवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाए जाने चाहिए। लड़कियों और अनुसूचित जातियों के बच्चों को समान अवसर मिलना चाहिए।

पाठ्यक्रम में बदलाव: पाठ्यक्रम को बच्चों की समझ और आवश्यकताओं के अनुरूप सरल और समसामयिक बनाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष:
स्कूली शिक्षा समाज के सर्वांगीण विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके मार्ग में कई कठिनाइयाँ हैं जिन्हें सुधारने की आवश्यकता है। यदि इन कठिनाइयों को ठीक से समझा और सुलझाया जाए, तो शिक्षा का स्तर बढ़ाया जा सकता है और बच्चों को बेहतर भविष्य प्राप्त हो सकता है। शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ कागजों पर अंक प्राप्त करना नहीं है, बल्कि यह बच्चों को एक बेहतर इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनाना है।

--संकलन
--अतुल परब
--दिनांक-09.12.2024-सोमवार.
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