Author Topic: * राज *  (Read 569 times)

Offline कवी-गणेश साळुंखे

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* राज *
« on: January 20, 2015, 10:10:05 PM »
गिरे हैे पत्ते आज शाखसे
जैसे उडे हो परींदे घरोंसे
होता था जहाँ शोरगुल हमेशा
वही बाते होती है खामोशी से
अंधेरे ने छुपाए है राज कुछ ऐसे
जिने डर लगता है उजालेसे...!
कवी-गणेश साळुंखे...!
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