Author Topic: * जवानी *  (Read 567 times)

Offline कवी-गणेश साळुंखे

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* जवानी *
« on: April 05, 2015, 10:53:21 PM »
ए हसीना ना कर गुरुर
तु अपने हुस्न पर
ए हसीना ना कर गुरुर
तु अपने हुस्न पर
ढल जाती है जवानी बुढापेमे
कुछ वक्त बित जाने पर.
कवी-गणेश साळुंखे.
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तलत

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Re: * जवानी *
« Reply #1 on: April 14, 2015, 07:09:54 AM »
जी हसन, हो आप मगन
करने मे अपना कवन
जैसा घुमता है पवन