Author Topic: * फर्क *  (Read 421 times)

Offline कवी-गणेश साळुंखे

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* फर्क *
« on: August 23, 2015, 11:13:22 PM »
तेरी मेरी मौहब्बतमें सनम
है फर्क सिर्फ इतना
तु समंदरका खारा पाणी
तो में एक बहता झरणा.
कवी-गणेश साळुंखे.
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