Author Topic: * फुल और पत्थर *  (Read 424 times)

Offline कवी-गणेश साळुंखे

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 884
  • Gender: Male
* फुल और पत्थर *
« on: September 27, 2015, 11:10:44 AM »
कभी हम भी फुलोंकी
तरह हुआ करते थे
लोग आते जाते रहे
हमारी खुशबु चुराते रहे
और मन भर जानेपर
पैरोतले रौंद दिये जाते थे
                   लेकिन अब
हम पत्थर बने बैठे हैं
तो लोग हमसे डरते हैं
अपनी किंमती चीजों को
हमसे संभालकर रखते हैं
कभी-कभार तो मुर्ख-अग्यानी
हमेंही भगवान समझकर पूजते हैं.
कवी - गणेश साळुंखे.
Mob - 7715070938

Marathi Kavita : मराठी कविता