Author Topic: ॠण जन्मदेचे  (Read 544 times)

Offline kumudini

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ॠण जन्मदेचे
« on: April 30, 2013, 02:39:27 PM »
     

आई  म्हणजे   आईच   असते

दुसर  तिसर   काहीच   नसते

तिच्या   मारत हि   मायाच   असते

तिच्या   मिठीत  संरक्षण   असते

लेकराची  ती   ढालच  असते   

सर्व  घाव   वरचेवर   झेलते

घास  जरी     कोरडा   असला

तरी  त्यात  अमृत   असते

दुर्गुणाला  सद्गुण  बनविते

कारण  तिचे  ते सामर्थ्य  असते

रस्त्यावरचे   काटे  अलगद   उचलते 

लेकराचा   मार्ग  निष्कंटक   करते 


अंगाईत  तिच्या  गंधर्वाचे  सूर  असते

मांडीवर  तिच्या   इंद्रपद  असते

अशी  आई  काय बोलावे  शब्द  नसते

म्हणून  ती शब्दातीत  असते

आई  ही  आद्य गुरु  असते

म्हणून ती  वर्णनातीत  असते

म्हणून म्हणती  भले

ॠण  न  जन्मदेचे  फिटे 

                                                    कुमुदिनी  काळीकर

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