Author Topic: माहेर  (Read 756 times)

Offline kumudini

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माहेर
« on: May 09, 2013, 03:14:33 PM »

आहे  राहणे  सासरला 

तरी  मन  धावे  माहेरला

शिराया  आईच्या  कुशीला 

तेय्हे  नजर  बाबाची 

भरलेल्या  कौतुकाची 

त्याच्या  मायेत  न्हायला 

तेथे  संगे  भाऊराया 

वेड्या  बहिणींची  माया

देतसे  शांती  जीवाला 

खेळ  खेळता  अंगणी 

मन  जाई  आंनदुनि 

पाहुनी   तुळशीला

रामप्रहरी  प्राजक्त 

सडा  शिम्पती अंगणी 

घेई  भरून  गंधाला

इथे  वैभव  नांदते 

सारे  सुख  हातासरसे 

तरी  आठव  माहेराला 

चिमण्याची  चिवचिव 

 पहाटेचा  तो  आरव 

जाग  आणिते  मनला 

माहेर  हे  स्थान 

नाही  उणे  तीर्थाहून

 तेथे  पूर  मायेचा  गंगेला

म्हणून  ही  कासाविशी 

माहेरची  याद  ताजी 

                     कुमुदिनी  काळीकर 

   

Marathi Kavita : मराठी कविता


Offline मिलिंद कुंभारे

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Re: माहेर
« Reply #1 on: May 10, 2013, 11:56:46 AM »
माहेर  हे  स्थान

नाही  उणे  तीर्थाहून

 तेथे  पूर  मायेचा  गंगेला

म्हणून  ही  कासाविशी

माहेरची  याद  ताजी 

छान :) :) :)

Offline विक्रांत

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Re: माहेर
« Reply #2 on: May 10, 2013, 02:29:33 PM »
सुंदर माहेर ,हेवा वाटाव अस.

Offline केदार मेहेंदळे

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  • मला कविता शिकयाचीय ...
Re: माहेर
« Reply #3 on: May 13, 2013, 10:23:45 AM »
chan

Offline प्रशांत नागरगोजे

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Re: माहेर
« Reply #4 on: May 13, 2013, 01:13:21 PM »
nice...