Author Topic: राधेय  (Read 544 times)

Offline kumudini

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राधेय
« on: May 15, 2013, 03:24:29 PM »
 
कर्णा  समान  दाता  विश्वात  नाही  झाला

अन्तीही  दान  केले  त्या  कवच  कुंडला ला

 तरीही  मनी सदैव  याचक  राहियेला

आई  विना  भिकारी  सिद्धांत  जीवनाला

अवहेलना  जगाची  मनी  नित्य  साहताना

असुनीही  अद्वितीय  सामान्य  तोच  ठरला

कृतकर्म  भोगतो  का   काहीच  आकळेना

जाळीत  नित्य  होता  आक्रोश  हा  मनाला

असतो कुपुत्र  जगती  नसते  कधी  कुमाता 

सिद्धांत  हाच  उलटा  राधेय  जीवनाचा

 तरीही  जगात  तोच  का  निंदनीय  ठरला

मंजूर  हेच  होते  का  विश्व  देवतेला

सुडाग्नी  हृदयी  त्याच्या  नियतीच  पेटवूनी 

का  खेळ  खेळली  ही  अगतिक  हा  म्हणूनी

आयुष्य  पार  त्याचे उधळूनी या  निघाले

अंती  क्षणात  तो  ही  जगी  नामशेष  झाला     

                                                            कुमुदिनी  काळीकर

Marathi Kavita : मराठी कविता


Offline मिलिंद कुंभारे

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Re: राधेय
« Reply #1 on: May 15, 2013, 04:00:49 PM »
nice poem!!! :) :) :)

Offline rudra

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Re: राधेय
« Reply #2 on: May 22, 2013, 05:55:24 PM »
kamudini.....karna ha mazha sarvat avadta yoddha.....
sundar likhan.....


Re: राधेय
« Reply #3 on: May 24, 2013, 11:40:31 AM »
Mastach kumudini
Karna hee mazi khup awadti personality ahe
tyavar eavdhi bhari kavita nahi pahili

Offline sweetsunita66

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Re: राधेय
« Reply #4 on: May 25, 2013, 06:37:13 PM »
मस्त !!!! अप्रतिम … छान वाचन आहे .  :) :)