Author Topic: राम पार  (Read 427 times)

Offline kumudini

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राम पार
« on: May 17, 2013, 03:31:13 PM »
 
तांबड  फुटल

झुंजूमुंजू  झाल

कोंबड  आरवील

जग  जागविल

कोटरात  पक्षी 

करीती  किलबिल

झेप  घेण्या  नभी

आतुरले मनी

गोठयात  गाई

वासराच्या  साठी

जाग्या  हम्बरल्या

पान्हा  देण्या  साठी

जळी  प्रतिबिंब 

रवि  किरणांचे

तेणे  जलाशय

झाले  कनकाचे

तडाग  फुलले

माण काचे   मळे

मंद  मंद  वारा

वर्षाव  मोती  दवाचा

असा  राम पार

चैतन्य  सागर

सुखाचा  वर्षाव

करी  चराचरी   

                     कुमुदिनी  काळीकर 

Marathi Kavita : मराठी कविता


Offline केदार मेहेंदळे

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  • मला कविता शिकयाचीय ...
Re: राम पार
« Reply #1 on: May 20, 2013, 03:49:59 PM »
suprabhat