Author Topic: मंदिर की बाजार  (Read 560 times)

Offline kumudini

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मंदिर की बाजार
« on: November 05, 2013, 11:26:13 AM »
                                    मंदिर  की  बाजार

आरोग्य  मंदिरी  दाटी  करती  पुजारी

घेती  शपथ  देवाचिये  पायी

येतील  भक्त  कोणी  करू  सेवा

नीरपेक्ष  निरलसपरी


नव्याचे  नऊ  दिन

जाती  उडून  भुरकन

सर्वांशी   गोड  बोलून

यथाकाल  जाई  निघून

घेती  पाशी  अडकवून

भक्त  भोळे  भाबडे

त्याच्यावर  विसंबले

सांगे  करी  त्यापरे

पाश  पुरा  आवळला

पुजाऱ्याने  कावा  साधला

म्हणे  पैसे  ठेव  ना  चाल  तर

करुनी  गयावया

पडला  हातापाया

पण  दगड  कधी  का  विरघळला

भक्त  कफल्लक  झाला

पुजारी  धनवंत  झाला

महाग  होता  सायकलीला

लागला  मोटार  उडवायला

हे  नव्हेत  पुजारी

हे  बडवे  बाजरी

तुका  म्हणे  त्यापरी

 त्यांना  पुजावे  कशासाठी

                                                  कुमुदिनी  काळीकर

Marathi Kavita : मराठी कविता

मंदिर की बाजार
« on: November 05, 2013, 11:26:13 AM »

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