Author Topic: पाउस  (Read 920 times)

Offline केदार मेहेंदळे

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पाउस
« on: August 26, 2014, 03:32:26 PM »
वनात पाउस जनात पाउस
गळके छप्पर घरात पाउस

उभे पिक हे जळू लागता
डोळ्या मधल्या पुरात पाउस

सुरकुतलेली माय आठवली
झरू लागला उरात पाउस

डबकी, होड्या आता न दिसती
बाल पाणीचा मनात पाउस

गाणी, गप्पा, चहा, पकोडे
चला भोगुया सुखात पाउस

श्रावण मासी हर्ष मनासी
उन्ह क्षणात, क्षणात पाउस

सावळ कांती भिजवून वेडा
गाऊ लागला सुरात पाउस

स्पर्श चोरटे छत्री मधले
सामील आहे कटात पाउस

पहाट फुलली मिठीत जेंव्हा
तेंव्हा होता भरात पाउस

पिकले केस, फिकीर कशाला?
बराच आहे ढगात पाउस
 
केदार...

Marathi Kavita : मराठी कविता


Mrunali Gaikwad

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Re: पाउस
« Reply #1 on: September 03, 2014, 10:21:32 AM »
khupach mannmohak kavita .....

apratim.....................