Author Topic: जुगनू जो ये मुस्कुराता, तो चांद भी जलने लगता था.....  (Read 544 times)

Offline Shraddha R. Chandangir

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बेवक्त की ऊस आंधी मे कहा ईतना दम था
मेरी तबाह जिंदगी से वो मंझर बेहद कम था।

मतलब से जो मीलते थे कुछ मतलबी थे दोस्त मेरे,
बेमतलब की यारी का वो खंजर भी कुछ नरम था।

प्यास आखिर बुझती है एक मीठे पानी के कतरे से
पर गहरे ऊस समंदर मे नजाने क्या भरम था।

जुगनू जो ये मुस्कुराता, तो चांद भी जलने लगता था
पर मेरी ईस मुस्कान के, अंदर एक जखम था।

राम के ऊस रामायण मे, वाह वाह हुई वानर की
जंगल के ऊस बंदर का ऐसाही कुछ करम था।

- अनामिका
« Last Edit: November 24, 2014, 03:56:48 PM by @Anamika »

Marathi Kavita : मराठी कविता


 

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