Author Topic: आवारा था किसी रोज....  (Read 525 times)

Offline Shraddha R. Chandangir

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आवारा था किसी रोज....
« on: September 16, 2015, 04:30:38 PM »
तेरी मोहब्बत में रंग के जबसे रंगीन हो गया हूँ
आवारा था किसी रोज, अब संगीन हो गया हूँ।
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मौजूदगी तेरी जिंदगी में मुझे मुकम्मल करती हैं
पर तुझे खोने के खौफ से, गमगीन हो गया हूँ।
.
तमाम नजारे दुनिया के पलट के कभी देखे नहीं
दिदार तेरा जबसे हुआ, अब शौकीन हो गया हूँ।
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ख्वाहिशे और हसरते तो तमाम थी जिंदगी में
तुझसे क्या मिलना हुआ, मुतमईन हो गया हूँ।
~ अनामिका

Marathi Kavita : मराठी कविता

आवारा था किसी रोज....
« on: September 16, 2015, 04:30:38 PM »

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Arun lade

  • Guest
Re: आवारा था किसी रोज....
« Reply #1 on: October 29, 2015, 10:47:38 AM »
शाळेतला पहिला दिवस
आज फारसा काही आठवत नाही
मागच्या बाकावर बसलेला
कोणी एक विद्यार्थी पाहतो
त्याच्यात मी दिसतो
असेच पुर्वीचे आठवून
आज मी विद्यार्थी घडवतो.

                अरुण व्ही. लाडे

 

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