Author Topic: जिम्मेदारीयाँ हैं जो टूटने नहीं देती... वर्ना तनहाई किसे प्यारी लगती हैं...  (Read 346 times)

Offline Shraddha R. Chandangir

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बेवजह हँसना मुझे खुमारी लगती हैं
पागल न समझो जिन्हें ये बीमारी लगती हैं।
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जिम्मेदारीयाँ हैं जो टूटने नहीं देती
वर्ना तनहाई किसे प्यारी लगती हैं।
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चल रही हैं साँसे पर तेरे इंतजार में
मेरी ये मुझी से गद्दारी लगती हैं।
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कल की खुशी से आज का क्या ताल्लूक
वो मीठी यादें अब खारी लगती हैं।
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छोडके जाना तेरी मजबूरी थी मगर
मुझे तो ये दुनियादारी लगती हैं।
~ अनामिका


 

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