Author Topic: व्यथा राधेची  (Read 870 times)

Offline kumudini

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व्यथा राधेची
« on: May 12, 2015, 06:34:19 PM »
        व्यथा   राधेची
आर्त  होऊनी  राधा  विनवी  बासुरीला
सोड  ग  श्रीहरी    अधराला

सखा  जरी माझा  श्रीहरी
असते  नित्य  तू  त्याच्या  अधरी
दया  कशी  ना  येई  तुजला
विरहाग्नी  हा  जाळी  मजला
डोळा  लागत  ना  डोळ्याला
व्याकुळला  जीव  श्रीहरी  सहवासाला
सुचतच  नाही  काही  मजला
का  छळसी  तू  मम  हृदयाला
स्त्री  असुनीही  का न
स्त्री  हृदयाला
                                             कुमुदिनी  काळीकर

Marathi Kavita : मराठी कविता


Offline सतिश

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Re: व्यथा राधेची
« Reply #1 on: May 13, 2015, 02:18:35 PM »
छानच..

जयंत

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Re: व्यथा राधेची
« Reply #2 on: May 19, 2015, 11:37:37 PM »
म्हणते बासुरी, "अगे, सुंदरी

अधरांजवळी धरता मज श्रीहरी

पसरती माझे स्वर गिरीकंदरी

साठव की ते तुझिया उदरी"