Author Topic: आंसू  (Read 653 times)

Offline Dhara

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आंसू
« on: October 23, 2015, 09:23:47 PM »
एक कांच को चाह थी पत्थर को पाने की,
उसके प्यार में टुंटकर बिखर जाने की,
मगर आया ऐसा मुकाम.. तकदीर ही बदल गयी दिवानों की,
इसमें खता थी ना उनकी ना ही जमाने की,
पत्थर ने ना दिखाई मोहब्बत ना कभी वफा की,
बीखर गयी कांच.. यांदे जल गयी हसीन मंजोरो  की,
कांच को आदत सी हो गयी थी अब.. एक बारीश में अक्सर भीग जाने की,
मगर वो ना थी कोई बरसात... पत्थर की आंखो  से आंसू निकले थे शायद!

Marathi Kavita : मराठी कविता

आंसू
« on: October 23, 2015, 09:23:47 PM »

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