Author Topic: का कळेना  (Read 2364 times)

Offline Sameer Nikam

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का कळेना
« on: September 21, 2012, 02:40:55 PM »
का कळेना आज काल मन का कुठे रमेना
काही केल्या कशात हि जीव लागेना

का  कळेना  तुझ्यात मी गुंतलो
जग  हे  सारे  मी  विसरलो
 
का  होते अशी हि जीवाची होरपळ
तुला  आठवताच होते  मनात  का आठवणीची धावपळ

का कळेना एकटाच मी गालात हसतो
बालिश रूप तुझे ते मनाच्या आरश्यात मी पाहतो

का  कळेना  तुला  माझे  वागणे  वेड्या  सारखे
सारे  कळून  देखील का वागतेस  परक्या  सारखे

तुझ्या  विना  दुसरे  काही  सुचेना ...
करू  काय  मी  काही  कळेना.

सांग  तूच  कशी  घालू  समजूत  वेड्या  माझ्या  मनाला
नाहीतर तूच  दे  दोष  माझ्या फुटक्या  नशिबाला.

का  कळेना  कधी  कळणार  तुला  माझ्या  भावना ..
तुला कळे परियंत जातोय सोडून मी साऱ्यांना....


कृपया कविता वाचल्यावर आपल्या प्रतिकिया द्याव्या कारण मी या क्षेत्रात नवीन आहे धन्यवाद
समीर स निकम
« Last Edit: September 21, 2012, 05:00:01 PM by Sameer Nikam »

Marathi Kavita : मराठी कविता

का कळेना
« on: September 21, 2012, 02:40:55 PM »

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Offline SANJAY M NIKUMBH

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Re: का कळेना
« Reply #1 on: September 22, 2012, 06:33:49 AM »
CHAN AHE PAN SHEVAT NIGETIV KA KELAS
PREMAT ASSHIL TAR POSITIVE PREM KAR
PREM MILO VA NA MILO TICHYAVAR FKT PREM KAR

Offline Sameer Nikam

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Re: का कळेना
« Reply #2 on: September 24, 2012, 07:28:40 PM »
thnks

 

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