Author Topic: भोगतो विरह नशीब माझे  (Read 1118 times)

Offline कवि । डी.....

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भोगतो विरह नशीब माझे
« on: April 12, 2014, 10:08:01 PM »
तुझं  जाणं  आज
फक्त   कारणंच  होत ...!!

स्वार्थी  म्हणून  तु ,
तुझं  गार्‍हाणं  होतं ...!!

खरं  प्रेम  माझं
तुला  कळालचं  नाही ...!!

मन  तुझं  माझ्याशी
कधी  जुळालचं   नाही ...!!

तोडायचं  होतं  मला
का  प्रेम  केलीस ...!!

जायचं  होतं  सोङून
का  जवळ  आलीस ...!!

काळीज  तुझं  दगडाचं
फुटेल  का  त्याला  पान्हा ...!!

प्रेम  तुला  दिले  मी
जगतो  आता  तुझ्याविना ...!!

एक  ना  अनेक
कारणे  आहेत  तुझे ...!!

मी  तर  सच्चा  प्रेमी
भोगतो   विरह   नशीब  माझे ...!!!


             । कवि-डी ।
                 स्वलिखीत
                  दि. 12.04.14
                 वेळ. रात्री.  10 .06
« Last Edit: April 13, 2014, 11:10:28 AM by कवि । डी..... »

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