Author Topic: कारगील  (Read 1537 times)

Offline kumudini

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कारगील
« on: May 28, 2013, 03:56:50 PM »
 

सीमेवर  शत्रू  दिसता

वीर  अमुचे  पेटून  उठती

घेऊनी  हात  तो  हाती

दोस्तीची  भाषा  ओठी

खंजीर  खुपसती  पाठी

त्या  शत्रूस  चिरडण्या  साठी

वीर  अमुचे  पेटून  उठती

हे वंशज  शिवरायाचे

झाशीच्या  रण राणीचे

त्या वीर   महाराण्याचे

गद्दारा  पळविण्या साठी

वीर  अमुचे  पेटून  उठती

तो  पवित्र  हिमालय  अमुचा

जो  ललाम  भूमातेचा

तो अपवित्र  जयांनी  केला

ती  आग  विझविण्यासाठी

वीर  अमुचे पेटून  उठती

घातला  सडा  रिपु  रक्ताचा

विझविण्या  हिमाच्या  ज्वाला

शत्रूच्या  कापूनी  माना

हा देश  रक्षण्या साठी

वीर  अमुचे  पेटून  उठती

ते अमरच  असती  जगती 

जे झुंजले  मातृ भूसाठी

हे  वंदन   त्यांच्या साठी

संगरी  शहीद  जे  झाले

त्या  अमुच्या  विरा  साठी

वीर  अमुचे  पेटून  उठती

                                    कुमुदिनी  काळीकर

Marathi Kavita : मराठी कविता


Offline केदार मेहेंदळे

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  • मला कविता शिकयाचीय ...
Re: कारगील
« Reply #1 on: May 29, 2013, 01:47:20 PM »
kavita chan aahe..pan pratyek kadav vigal lihayla hava.
 

Offline कवि - विजय सुर्यवंशी.

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  • सई तुझं लाघवी हसणं अजुनही मला वेड लावतं.....
Re: कारगील
« Reply #2 on: June 05, 2013, 10:48:25 PM »
Chan! Vapar kelela ahe upmancha.a

Offline मिलिंद कुंभारे

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  • ती गेली तेव्हा रिमझिम पाऊस निनादत होता!
Re: कारगील
« Reply #3 on: June 06, 2013, 11:06:44 AM »
छान  :)