Author Topic: हताश गंगा  (Read 1072 times)

Offline kumudini

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हताश गंगा
« on: June 13, 2013, 08:43:09 PM »
गंगेची  गटार  गंगा  केल्य्च्या   पार्श्व भूमीवर  गंगेची  विमनस्कता
हताश  गंगा

मी  गंगा  पाप  विनाशिनी
कधीच  विसरून  गेले
भगीरथा  शरण
तुला  मी  आले
तरण्यास  तव  पूर्वजास
भूवर  तू  आणीलेस
ते  सारे  तरुनी  गेले
अन  माझे  बघ
बघ  काय  असे  झाले
पापी  ते बहुतची  तरले
पापी  मी  आकंठ  बुडाले
मत्स्थानी  मजसी  ने
म्हणूनी  तुजसी  आर्जविले
                                 

कुमुदिनी   काळीकर

Marathi Kavita : मराठी कविता


Offline मिलिंद कुंभारे

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  • ती गेली तेव्हा रिमझिम पाऊस निनादत होता!
Re: हताश गंगा
« Reply #1 on: June 15, 2013, 03:45:01 PM »
छान

Offline sweetsunita66

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  • प्रेमा साठी जगणे माझे ।
Re: हताश गंगा
« Reply #2 on: June 18, 2013, 03:38:37 PM »
 :) :)गंगा बचाव अभियाना साठी छान लिहिलं