Author Topic: आई  (Read 9507 times)

Offline Vikas Vilas Deo

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आई
« on: June 22, 2013, 02:52:33 PM »
आई हे ईश्वराचे
पवित्र-पावन नाव
माया,प्रेम,आपुलकी
व वात्सल्याने गजबजलेले गाव.

आई हे देवासमोर
सतत जळणारी निरांजन,
जगातील सर्वात मोल्यवान
कधीही न संपणारे धन.

आई हे प्रेम देणारा
अमृताने भरलेला झरा,
मनाच्या जखमेवर
मायेची फुंकर घालणारा वारा.

आई हे वात्सल्याने
काठोकाठ भरलेला सागर,
रसाळ मधुर वाणीने भरलेली घागर.

आई हे मृत्यूवर
मात करणारे अमृत,
सदा आशीर्वाद देणारा
देवतुल्य हस्त.

Marathi Kavita : मराठी कविता

आई
« on: June 22, 2013, 02:52:33 PM »

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Offline मिलिंद कुंभारे

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  • ती गेली तेव्हा रिमझिम पाऊस निनादत होता!
Re: आई
« Reply #1 on: June 22, 2013, 04:22:57 PM »
छान..... :)

Offline sweetsunita66

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  • प्रेमा साठी जगणे माझे ।
Re: आई
« Reply #2 on: July 02, 2013, 12:48:11 AM »
एक बार मां बाह पसारे ,
मुझे सीने से लगा लो तुम ,
हृदय लगाकर एक बार मां ,
मुझे आंचल में छुपा लो तुम ,
ना रहे कोई  ख्वाहिश ,
और ना रहे वो अधुरापन ,
ढूढ रही हू गावं-गावं ,गली-गली मेरा बचपन ……  जिसके पास मां नही ,उन सबके लिए …… क्यो की ये दुख वो ही जानते हैं ……… सुनिता 

Offline vijaya kelkar

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Re: आई
« Reply #3 on: July 02, 2013, 09:47:05 AM »
            सुंदर .................

Offline कवि - विजय सुर्यवंशी.

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  • सई तुझं लाघवी हसणं अजुनही मला वेड लावतं.....
Re: आई
« Reply #4 on: July 02, 2013, 05:15:55 PM »
सुनिता छान मातृभाषेबरोबर राष्ट्रभाषेवरही प्रेम....


एक बार मां बाह पसारे ,
मुझे सीने से लगा लो तुम ,
हृदय लगाकर एक बार मां ,
मुझे आंचल में छुपा लो तुम ,
ना रहे कोई  ख्वाहिश ,
और ना रहे वो अधुरापन ,
ढूढ रही हू गावं-गावं ,गली-गली मेरा बचपन ……  जिसके पास मां नही ,उन सबके लिए …… क्यो की ये दुख वो ही जानते हैं ……… सुनिता

Offline sweetsunita66

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Re: आई
« Reply #5 on: July 02, 2013, 09:17:32 PM »
धन्यवाद विजय !कविता लिहायची सुरुवातच राष्ट्रभाषेतून झाली  ,,,,,,सुनिता

 

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