संत सेना महाराज- शीर्षक: आत्म-वारीक (आत्मा-नाई)-

Started by Atul Kaviraje, October 17, 2025, 10:47:13 AM

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Atul Kaviraje

संत सेना महाराज-

शीर्षक: आत्म-वारीक (आत्मा-नाई)

कडवा १:
हम हैं नाई, हैं वारीक, वृत्ति से हैं निर्मल।
करते हैं हजामत, मन की संपूर्ण, सकल॥
विकारों के बाल, काटते हैं बहुत बारीक।
साधू संतों का यह काम, जानो है अलौकिक॥

कडवा २:
विवेक दर्पण आईना दिखायेंगे, देख लो अपना मुख।
सत्य-असत्य समझ आएगा, दूर होगा सारा दुःख॥
अज्ञान की मैल, आईने में दिखाई दे।
बुद्धि का प्रकाश, आत्मा को प्राप्त हो जाए॥

कडवा ३:
वैराग्य का चिमटा हाथ में, वासनाएँ उखाड़ेंगे।
मोह के सारे तंतु, जड़ से ही काट डालेंगे॥
संसार के सुख की, नहीं चाहिए आसक्ति।
परमार्थ में रंग जाए, यही है सच्ची भक्ति॥

कडवा ४:
उदकशांति सिर पर घोलेंगे, शांति का सींचन।
समाधान, क्षमाशीलता से, मन हो जाए पावन॥
शांति मिलती है जब, चित्त हो जाता स्थिर।
नामस्मरण मधुर लगे, हरि का हो गजर॥

कडवा ५:
अहंकार की शिखा (चोटी), तुरंत निचोड़कर निकाल देंगे।
मैं-मेरापन का भाव, मैल हो जाएगा नहीं॥
श्रेष्ठता का घमंड, तोड़ेंगे अब जड़ से।
दासता पंढरी की, यही हमें अनुकूल॥

कडवा ६:
काम क्रोध नाखून निकालेंगे, लोभ मद मत्सर।
षड्रिपुओं का शस्त्र, न हो हृदय के अंदर॥
भावार्य की बगलें झाड़ेंगे, न हो पाखंड का भाव।
शुद्ध भक्ति की राह, यही है सच्चा ठिकाव॥

कडवा ७:
चारों वर्णों को देकर हाथ, समता का संदेश।
किसी को न रखें दूर, जाति का न हो द्वेष॥
सभी जीवों को आधार, वारीक सेना।
निर्वांत समाधान में, हुई आत्म-वंदना॥

--अतुल परब
--दिनांक-16.10.2025-गुरुवार.
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