आंतरिक सत्य- किसी से भी झूठ बोले लेकिन, स्वयं से कभी भी झूठ ना बोले।

Started by Atul Kaviraje, October 18, 2025, 10:19:13 PM

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Atul Kaviraje

आंतरिक सत्य-

किसी से भी झूठ बोले लेकिन, स्वयं से कभी भी झूठ ना बोले।

१.
दुनिया सूक्ष्म पर्दों की मांग कर सकती है,
एक कोमल शब्द जो विफल हो जाता है।
मन की शांति के लिए एक सत्य को रोका गया,
सबसे दयालु कल्पना जो आप पा सकते हैं।

२.
क्योंकि सामाजिक शिष्टाचार को एक आवरण की आवश्यकता होती है,
उन विचारों को छिपाने के लिए जो अदृश्य हैं।
आप प्रवाह में फिट होने के लिए तथ्यों को मोड़ सकते हैं,
उन सार्वजनिक बीजों को बनाए रखने के लिए जो आप बोते हैं।

३.
लेकिन जब दरवाज़ा बंद और ताला लगा हो,
और शांत अंतरात्मा खुल जाती है।
किसी से भी झूठ बोले, अगर आपको भटकना पड़े,
लेकिन बनावट को हटा दें।

४.
लेकिन स्वयं से कभी भी झूठ ना बोले, वह मूल,
जिसके लिए आपकी आत्मा संघर्ष करती है।
आपका मकसद स्पष्ट और उज्जवल होना चाहिए,
रात के खिलाफ एक जलता हुआ दीपक।

५.
क्योंकि आत्म-धोखा बढ़ना शुरू हो जाता है,
एक कड़वा बीज जिसे कोई नहीं जान सकता।
यह उद्देश्य को ज़हर देता है, इच्छाशक्ति को मंद करता है,
और खाली वादे को अभी भी छोड़ देता है।

६.
मास्टर बिल्डर अपनी कमियों को जानता है,
और तालियों के पीछे नहीं छिपता।
वह गलती का नाम लेता है, कमी जानता है,
रास्ता खोजने का यही एकमात्र तरीका है।

७.
तो उस दर्पण को साफ और सच्चा रखें,
गहरी नज़र जो आपको दर्शाती है।
हर विफलता, हर ऊंचाई,
ईमानदार, स्थिर प्रकाश से सामना किया जाए।

--अतुल परब
--दिनांक-18.10.2025-शनिवार.
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