अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक ५४-स्थितप्रज्ञ की पहचान-🏹🙇🕊️🗣️ → 🧘‍♂️💎🗣️🌬️

Started by Atul Kaviraje, October 19, 2025, 07:12:09 PM

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Atul Kaviraje

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक ५४-

अर्जुन उवाच ।

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ २‑५४॥

हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
📜 दीर्घ हिंदी कविता - श्रीमद्भगवद्गीता अ.२ श्लो.५४ 🕉�
शीर्षक : स्थितप्रज्ञ की पहचान

(छंद १)
कुरुक्षेत्र के रणस्थल में, धनुष्य को छोड़ डाल। 🏹
अर्जुन ने झुक कर पूछा, श्रीकृष्ण से प्रश्न विस्तराल। 🙇
"हे केशव! बता दो मुझे, स्थितप्रज्ञ कौन है? 🕊�
उसका व्यवहार कैसा? बता उसकी पहचान है।" 🗣�

शब्दार्थ: रणस्थल = युद्धभूमि; धनुष्य = धनुष्य; स्थितप्रज्ञ = स्थिर बुद्धि वाला; पहचान = लक्षण.

(छंद २)
"समाधिस्थ जो पुरुष, बुद्धि स्थिर जिसकी। 🧘�♂️
अटल, अडोल, अविचल, अति पावन जिसकी। 💎
वह कैसे बोलता है प्रभु? क्या कहता है वाणी? 🗣�
कैसा होता है उच्चार? बता यह बखानी।" 🌬�

शब्दार्थ: समाधिस्थ = ध्यानमग्न; अटल = दृढ; अडोल = हिलने वाला नहीं; पावन = पवित्र; बखानी = वर्णन.

(छंद ३)
"कैसा रहता है बैठकर? क्या है उसकी मुद्रा? 👑
कैसी है उसकी स्थिति? क्या है उसका ध्यान? 🧎�♂️
चलता कैसा है वह? कैसी है उसकी गति? 🚶�♂️
हरकतें बता सब, हे त्रिभुवन के पति।" 🌍

शब्दार्थ: मुद्रा = स्थिति; हरकतें = हलचलें; त्रिभुवन के पति = तीनों लोकों के स्वामी (कृष्ण).

(छंद ४)
"बता प्रभु, स्थितधी का, व्यवहार कैसा सारा? 🌟
बोलना, चलना, बैठना, यही है अपार। 💫
जिसे आत्मतत्त्व का ज्ञान, जो विरला है विकारी। ☀️
जिसकी नहीं देहबुद्धि, वह बोले क्या? कैसे? ❓

शब्दार्थ: स्थितधी = स्थिर बुद्धि; अपार = अथाह; आत्मतत्त्व = आत्म तत्त्व; विरला = लुप्त.

(छंद ५)
"सुख-दुःख में एक सा, समत्व योग जिसका। ⚖️
लाभ-हानि का नहीं, मान-अपमान का विचार। 🤝
इंद्रियों के विषयों से, सदा रहता है निर्विकार। 🚫
ऐसा जिसका जीवन, वह प्रभाषेत क्या? 🎤

शब्दार्थ: समत्व = समान भाव; निर्विकार = विकाररहित; प्रभाषेत = बोलेगा.

(छंद ६)
"राग-द्वेष के पार, वह एक का ही विश्वास। ✨
आसक्ति के बंधनों से, मुक्त सारे पाश। 🕊�
एकांत में कैसा? और समूह में कैसा? 👥
ये अर्जुन के प्रश्न, श्रीहरी को लगे रस्स। 😊

शब्दार्थ: आसक्ति = लगाव; पाश = बंधन; एकांत = अकेला; समूह = भीड़; रस्स = अच्छे लगे.

(छंद ७)
"यह सुनकर प्रश्न यह, गीता का मुख्य आधार। 📖
बताएंगे हरी अब, ज्ञान का अपार भंडार। 🎁
स्थितप्रज्ञ का सच्चा, मार्ग जो उज्ज्वल। 🌅
लक्षण बताते हैं, अर्जुन को कर निर्मल। 🌸

शब्दार्थ: अपार = असीम; भंडार = भंडार; उज्ज्वल = उजला; निर्मल = शुद्ध।

इमोजी सारांश (Emoji Saransh):
🏹🙇🕊�🗣� → 🧘�♂️💎🗣�🌬� → 👑🧎�♂️🚶�♂️🌍 → 🌟💫☀️❓ → ⚖️🤝🚫🎤 → ✨🕊�👥😊 → 📖🎁🌅🌸

--अतुल परब
--दिनांक-19.10.2025-रविवार
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