📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक ५५-कविता 🕉️

Started by Atul Kaviraje, October 21, 2025, 10:44:57 AM

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Atul Kaviraje

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक ५५-

प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ २‑५५॥

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: श्लोक ५५ - लंबी हिंदी कविता 🕉�
(यमक और तुकांत सहित)

🕯� पद १: प्रस्तावना और प्रश्न 🕯�
हे अर्जुन वीर, सुनो धीर, 🎯
स्थितप्रज्न की क्या है असली परिभाषा? 🤔
जिसकी स्थिरता गगन सी विशाल,
यह प्रश्न मन में उठता है बार-बार। 💭

🌊 पद २: इच्छाओं का तूफ़ानी सागर 🌊
मन की इच्छाएं, वासनाओं का तूफ़ान, 🌪�
सुख-दुःख का यह अंतहीन चक्र घूमे। ☯️
कामना रूपी लहरें, मन डोलता रहे,
यह संसार सागर बहुत विषम लगे। 🌊

🧘 पद ३: त्याग की पहली सीढ़ी 🧘
प्रजहाति यदा कामान् - जब छोड़ दे सब आस, ✋
मन के सभी कल्लोल, सभी हाव-भाव। 🧠
बाहरी नहीं, अंदर की इच्छाओं का,
करता त्याग, यही है पहला कदम। 👣

😊 पद ४: आत्मतृप्ति का अनंत सुख 😊
आत्मन्येवात्मना तुष्टः - आत्मा में आत्मा से तृप्त, ☀️
बाहरी साधनों का नहीं लगता अहसास। 🙅♂️
स्वयंभू समाधान का स्रोत, हृदय में बहता,
शांत आनंद का, यह अमृत समान प्यास। 🍶

🕊� पद ५: स्थितप्रज्ञ की पहचान 🕊�
स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते - तब उसे स्थितप्रज्ञ जान, 🌳
तूफ़ानी हवाएं, उसकी शांति को न पहुंचा पाए नुकसान। 🌬�🍃
न दुःख से भय, न सुख का उत्साह,
समभाव के पात्र के, वह समान। ⚖️

🌅 पद ६: जीवन जीने की कला 🌅
बाहर कर्म की धमाल, भीतर आत्मा की शांति, 🎭🕉�
विश्व की सेवा करे, पर रहे स्वयं में। 🤝🧘
इच्छारहित कर्मयोगी, यही उसका असली रहस्य,
जग ये रंगमंच, वह एक नट जैसा। 🎭

🙏 पद ७: समापन और प्रार्थना 🙏
हे कृष्ण, तुमने कही ये उच्च बात, 🕊�
हम सामान्य को, है कितनी दूर ये बात? 😔
फिर भी दे बल, ये रास्ता चलते रहें,
आत्मतृप्ति का तत्व, हृदय में समझ आए। 💖

--अतुल परब
--दिनांक-20.10.2025-सोमवार.
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