कोमल आवाज़-

Started by Atul Kaviraje, October 21, 2025, 11:52:24 AM

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Atul Kaviraje

कोमल आवाज़-

अपनी आवाज़ नहीं, अपने शब्दों को उठाएँ। फूल गरजने से नहीं, बारिश से उगते हैं।

१.
जिस क्षण आप देखते हैं कि गुस्सा बढ़ रहा है,
और आपकी आँखों में आग जल उठती है।
अपनी आवाज़ नहीं, अपने शब्दों को उठाएँ, इसे याद रखें,
फुफकार नहीं, नरम दृढ़ विश्वास से बोलें।

२.
क्योंकि चिल्लाने से केवल आवाज़ आती है,
जबकि ज्ञान का संदेश तुरंत डूब जाता है।
सुनने वाला डरकर दूर हट जाता है,
और अर्थ साल-दर-साल गायब हो जाता है।

३.
तूफान आने पर आसमान को देखें,
जब गरज लुढ़कती है और फाड़ने लगती है।
यह खिड़की को हिलाती है, पत्थर को तोड़ती है,
लेकिन बगीचे को बिल्कुल अकेला छोड़ देती है।

४.
फूल गरजने से नहीं, बारिश से उगते हैं,
कोमल बूँदें नीचे से जीवन खींचती हैं।
एक धैर्यपूर्ण रिमझिम, नरम और शांत,
तालाब को भर देगी और पूल को साफ कर देगी।

५.
तो आपकी सलाह वह बौछार हो,
स्थिर शक्ति की एक शांत ताकत।
हर शब्दांश को तोला जाए,
एक मापा हुआ विचार जो कम नहीं होगा।

६.
तर्क की शक्ति इतनी ऊंची खड़ी होती है,
जोर से पुकारने की आवश्यकता के बिना।
जब जुनून का तर्क मंच संभालता है,
कोई भी क्रोधित चिल्लाहट पृष्ठ के लायक नहीं होती।

७.
शांति, अनुग्रह और प्रकाश के साथ सत्य बोलें,
अंधेरे को उज्जवल में बदलने के लिए।
पानी की तरह बनें, गहरा और धीमा,
सबसे दयालु आवाज़ें ही वे हैं जो बढ़ती हैं।

--अतुल परब
--दिनांक-20.10.2025-सोमवार.
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