दृश्यमान भूमि-

Started by Atul Kaviraje, October 21, 2025, 11:58:14 AM

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Atul Kaviraje

दृश्यमान भूमि-

उडने में बुराई नही है, आप भी उडे, लेकिन उतना ही जहाँ से जमीन साफ दिखाई देती हो।

१.
आत्मा अज्ञात ऊँचाइयों के लिए तरसती है,
एक ऐसा आकाश पाने के लिए जो उसका अपना हो।
दृष्टि के पंखों के साथ, मजबूत और मुक्त,
विनम्रता से ऊपर उठने के लिए।

२.
साहसी और सच्चा होकर उडने में बुराई नही है,
उन दृश्यों को खोजने के लिए जो आपका इंतजार कर रहे हैं।
आप भी अपनी पूरी ताकत से उडे,
और प्रकाश की महिमा की तलाश करें।

३.
लेकिन जैसे ही आप मज़बूत धाराओं पर चढ़ते हैं,
उस जगह तक पहुँचने के लिए जहाँ आप संबंधित हैं।
याद रखें कि हवा पतली होती है,
और सावधानी ही भीतर का नियम है।

४.
लेकिन उतना ही जहाँ से जमीन साफ दिखाई देती हो, अपनी जगह जानो,
अपनी जड़ों को शांत अनुग्रह के साथ बनाए रखें।
कृतज्ञता को आपका गहरा लंगर बनने दें,
वे सरल वादे जो आप निभाते हैं।

५.
क्योंकि एक बार जब पृथ्वी एक धुंधलापन बन जाती है,
सारा सामान्य ज्ञान डगमगाने लगता है।
जब ऊँचाई से अहंकार आता है, तो पतन महान होता है,
चक्करदार हवा आपका भाग्य सील कर देती है।

६.
याद रखें कि यात्रा कहाँ से शुरू होती है,
मदद करने वाले हाथ, और प्रियजन।
जीवन का नक्शा नीचे खींचा गया है,
वह मार्ग जिसने आपकी आत्मा को बढ़ने दिया।

७.
तो बादलों से ऊपर, इतनी ऊँची उड़ान भरो,
आकाश के नीचे एक विजेता।
लेकिन अपनी दृष्टि को नीचे की ओर जाने दो,
जो ज़मीन से जुड़ा रहता है, वही ताज पहनता है।

--अतुल परब
--दिनांक-20.10.2025-सोमवार.
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