विवेक का गुण-

Started by Atul Kaviraje, October 21, 2025, 10:45:39 PM

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Atul Kaviraje

विवेक का गुण-
(सार्वजनिक आलोचना अपमान बन जाती है; निजी आलोचना सलाह में बदल जाती है)

सार्वजनिक रूप से की गयी आलोचना अपमान में बदल जाती है और... एकांत में बताने पर सलाह बन जाती है।

१.
एक गलती देखी जाती है, एक सत्य जाना जाता है,
परिवर्तन का एक बीज जिसे बोया जाना चाहिए।
शब्दों का लक्ष्य उत्थान करना है,
खुले दिल से एक आवश्यक उपहार देना।

२.
लेकिन उस जगह को चुनें जहाँ शब्द उतरते हैं,
स्पष्टता और प्रकाश लाने के लिए।
सार्वजनिक रूप से की गयी आलोचना, ज़ोरदार और स्पष्ट,
डर पैदा करने से ज़्यादा कुछ नहीं करती।

३.
अहंकार तेज़ी से और तुरंत उठता है,
उस न्याय से लड़ने के लिए जो डाला जाता है।
संदेश खो जाता है, आत्मा को चोट पहुँचती है,
और दयालु इरादे का दुरुपयोग होता है।

४.
अपमान में बदल जाती है, तीखा और गहरा,
एक गुप्त घाव जिसे आत्मा रखेगी।
दर्शक न्यायाधीश बन जाते हैं,
और सत्य एक शिकायत में घुल जाता है।

५.
अब सबक को दूसरी तरफ मोड़ें,
जहाँ दीवारें सुरक्षित रूप से छिपा सकती हैं।
लेकिन एकांत में बताने पर, नरम और धीमी आवाज़ में,
आप विश्वास को बढ़ने का मौका देते हैं।

६.
ईमानदार शब्द का स्वागत अनुग्रह के साथ किया जाता है,
किसी के चेहरे को बचाने की ज़रूरत के बिना।
मन खुला, शांत और स्थिर होता है,
आपकी इच्छा का सबक सीखने के लिए।

७.
यह सलाह बन जाती है, बुद्धिमान और सच्ची,
वह हाथ जो नई आत्मा का मार्गदर्शन करता है।
पहले सम्मान की रक्षा करें, फिर अपना दावा बोलें,
और प्रतिक्रिया के खेल में सफलता पाएँ।

--अतुल परब
--दिनांक-21.10.2025-मंगळवार.
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