📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-५७-समत्व योग-

Started by Atul Kaviraje, October 23, 2025, 11:44:22 AM

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Atul Kaviraje

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-५७-

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ २‑५७॥

शीर्षक: समत्व योग (हिन्दी अनुवाद)
(मराठी काव्य "समत्व योग" का शुद्ध, क्रमबद्ध व पूर्ण हिन्दी अनुवाद)

🔷 (कडवा १ - आरंभ)

पद १: ज्ञानी मन की पहचान
न कोई मोह रखता, न रिश्तों में, न काम में,
वह अनासक्त सर्वत्र, रहता आत्म-आराम में।
जिसका चित्त निर्मोही, न किसी का भी है द्वेष,
वही स्थितप्रज्ञ है योगी, देता जग को उपदेश।।

(🔹 अर्थ:
जिसका मन किसी में नहीं उलझा,
जो हर क्षेत्र में अनासक्त रहकर आत्म-ज्ञान में स्थित है,
वही मोह से रहित ज्ञानी व्यक्ति स्थिर बुद्धि वाला होता है।)

🎭 (कडवा २)

पद २: जीवन के द्वंद्व
जीवन की राहों पर, रंग आते हैं अनेक,
कभी लाभ का अवसर, कभी हानि का विवेक।
कभी शुभ समाचार, कभी दुखद आघात,
इसी में साधारण मन, हो जाता विचलित, त्रस्त।।

(🎭 अर्थ:
जीवन में लाभ-हानि, सुख-दुख जैसे प्रसंग बार-बार आते हैं।
इन घटनाओं से आम व्यक्ति का मन बेचैन और पीड़ित होता है।)

✨ (कडवा ३)

पद ३: शुभ का स्वीकार
मिलने पर बड़ी वस्तु, मान-सम्मान या धन,
वह पुरुष नहीं करता, उसका अति-अभिनंदन।
संसार के इस खेल का, वह जानता है धर्म,
केवल कर्तव्य करता, न रखे कोई भी गर्व।।

(✨ अर्थ:
जब उसे कोई बड़ी, शुभ वस्तु प्राप्त होती है
जैसे की यश, सम्मान या धन –
तब भी वह व्यक्ति उसका अत्यधिक आनंद नहीं मनाता,
क्योंकि उसे संसार की क्षणभंगुरता का ज्ञान होता है।)

🌑 (कडवा ४)

पद ४: अशुभ से तटस्थता
होने पर बड़ा अनर्थ, या अपमान भी भारी,
मन में द्वेष, निराशा, कभी न वह है धारी।
अशुभ आए तो भी, न क्रोध का हो पारा,
अंधेरे को वह स्वीकरे, जैसे आकाश का तारा।।

(🌑 अर्थ:
जब कुछ बुरा या अपमानजनक होता है,
तब भी वह व्यक्ति न तो द्वेष करता है, न ही निराश होता है।
वह उस अंधकार को भी वैसे ही स्वीकार करता है
जैसे आकाश का तारा अंधेरे में चमकता है।)

💡 (कडवा ५)

पद ५: बुद्धि की स्थिरता
न हर्ष और न शोक, मन की यही तटस्थता,
सुख-दुःख की लहरों पर, ऐसी उसकी दक्षता।
जैसे दीपक की लौ, वायु से न हो विचलित,
वैसा ही उसका अंतरंग, आत्म-ज्ञान से प्रकाशित।।

(💡 अर्थ:
उसकी बुद्धि सुख-दुःख की परिस्थितियों में भी डगमगाती नहीं।
जैसे हवा में भी दीपक की लौ स्थिर रहती है,
वैसे ही उसका अंतर आत्मज्ञान के प्रकाश में स्थिर होता है।)

🧘 (कडवा ६)

पद ६: साधक की स्थिति
क्षण भर के सुख का लोभ, क्षणिक दुःख का त्रास,
इससे ऊपर जाकर, आत्मा में है निवास।
इसीलिए उसे श्रीहरि, 'स्थितप्रज्ञ' यह नाम दें,
जो समता को रखता, वही बुद्धि को स्थिर जानें।।

(🧘 अर्थ:
जो मनुष्य क्षणिक सुख-दुख से ऊपर उठकर आत्मा के शाश्वत स्वरूप में स्थित रहता है,
उसे ही श्रीकृष्ण 'स्थितप्रज्ञ' कहते हैं।
समभाव बनाए रखना ही बुद्धि की स्थिरता की कुंजी है।)

💫 (कडवा ७ - समापन व निष्कर्ष)

पद ७: समत्व ही योग
समभाव से जीना, है गीता का सार यही,
बुद्धि स्थिर जिसकी हुई, वही भव पार हो ही।
अनासक्ति का है मंत्र यह, प्रज्ञा करे प्रतिष्ठित,
सकल जीवन का रहस्य, श्लोक-सत्तावन वर्णित।।

(💫 अर्थ:
समभाव रखकर जीवन जीना ही गीता का मूल संदेश है।
अनासक्ति से ही बुद्धि स्थिर होती है और वही व्यक्ति
इस जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सकता है।
यह श्लोक संपूर्ण जीवन का महान रहस्य उजागर करता है।)

🧠 ईमोजी सारांश (EMOJI SARANSH):

🧘 (स्थितप्रज्ञ) + 🚫 (अनासक्ती) + 🌎 (सर्वत्र) ↔️ (समभाव)
🥳 (शुभ) और 😥 (अशुभ) ➡️ 🚫 (ना) 😊 (अति-आनंद) और 🚫 (ना) 😡 (द्वेष)
= ✅ (परिणाम) 🧠 (बुद्धि) 🧱 (स्थिर/प्रतिष्ठित)

--अतुल परब
--दिनांक-22.10.2025-बुधवार.
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