📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-५८-'स्थितप्रज्ञ कछुआ'🚫🍎🍷💰

Started by Atul Kaviraje, October 24, 2025, 10:39:59 AM

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Atul Kaviraje

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-५८-

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ २‑५८॥

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक ५८

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ २-५८॥

श्लोक का अर्थ (संक्षेप में):

जैसे कछुआ अपने अंगों को चारों ओर से समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष अपनी इंद्रियों को इंद्रियों के विषयों से पूरी तरह खींच लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।

🌿 दीर्घ हिंदी कविता - 'स्थितप्रज्ञ कछुआ'

पद्य १ : आरंभ

काव्य-पंक्तियाँ :
जब जीव इस जग में, कछुए सा व्यवहार करे,
अंग और इंद्रियों को, सहज भीतर धरे;
जैसे कछुआ अपना, सिर कवच में डाल लेता,
वैसे ही मन शांत कर, शांति सदा पा लेता. 🙏

भावार्थ:
जब मनुष्य संसार में कछुए की तरह व्यवहार करता है — अपनी इंद्रियों को भीतर की ओर समेट लेता है, तब वह बाह्य आकर्षणों से मुक्त होकर मन की शांति को प्राप्त करता है।

पद्य २ : इंद्रिय-संयम

काव्य-पंक्तियाँ :
त्वचा, कान, आँख, रसना, गंध-स्पर्श के कारण,
बाहरी विषयों से, हटा लेता है मन;
इंद्रियार्थों के सम्मुख, वह तटस्थ खड़ा,
लाभ न हानि उसे, आत्म-ज्ञान है बड़ा. 💎

भावार्थ:
इंद्रियाँ — त्वचा, कान, नेत्र, रसना और नाक — जब अपने विषयों से दूर रखी जाती हैं, तब मनुष्य स्थिर होता है। इंद्रियार्थों के सम्मुख भी वह तटस्थ रहता है, और आत्म-ज्ञान में स्थिर रहता है।

पद्य ३ : प्रज्ञा की स्थिरता

काव्य-पंक्तियाँ :
विषयों का आकर्षण, वहाँ बाकी न रहता,
वासनाओं की ज्वाला, शांत होकर बहता; 💧
मन शांत हो काया में, विषयों को त्यागे,
बुद्धि उसकी तभी, आत्म-स्वरूप में जागे. 🧘�♂️

भावार्थ:
जब विषयों का आकर्षण समाप्त होता है और वासनाएँ शांत होती हैं, तब मन अंतर्मुख हो जाता है। तब बुद्धि आत्म-स्वरूप में जागृत होती है — यही स्थिर बुद्धि की स्थिति है।

पद्य ४ : कछुए का उदाहरण

काव्य-पंक्तियाँ :
कछुए का उदाहरण, ज्ञान का आधार, 💪
कवच से रक्षा करता, न हो कोई वार;
वैसे ही ज्ञानी भी, बुद्धि को ढाल बनाता,
नश्वर जग के मोह को, पल भर में मिटाता. 👑

भावार्थ:
कछुआ अपने कठोर कवच से अपने को सुरक्षित रखता है; वैसे ही ज्ञानी पुरुष अपनी बुद्धि को कवच बनाकर संसार के मोह को पल भर में नष्ट कर देता है।

पद्य ५ : आत्मबल और संयम

काव्य-पंक्तियाँ :
यह मात्र विषयों से, डरकर भागना नहीं,
वश इंद्रियों को करना, शक्ति यही सही; 🎛�
मोहक वस्तुएँ सारी, सम्मुख रहें अगर,
चित्त-वृत्ति शांत रहे, न हो भ्रमित डगर. ✨

भावार्थ:
विषयों से भागना संयम नहीं है — सच्चा संयम है इंद्रियों को अपने नियंत्रण में रखना। मोहक वस्तुएँ सामने हों, फिर भी मन शांत रहे — यही आत्मबल की निशानी है।

पद्य ६ : स्थितप्रज्ञता का फल

काव्य-पंक्तियाँ :
'प्रतिष्ठिता प्रज्ञा' यह, संयम का ही फल, 🎁
स्थायी आत्म-शांति का, यही असली बल;
मन के चंचलपन को, वह दे देता मात,
फिर नित्य-निरंतर, आत्म-सुख का साथ. 😊

भावार्थ:
स्थिर बुद्धि ("प्रतिष्ठिता प्रज्ञा") इंद्रिय-संयम का ही परिणाम है। इससे स्थायी आत्म-शांति और आत्म-सुख की प्राप्ति होती है, और मन के चंचलपन पर विजय मिलती है।

पद्य ७ : समापन

काव्य-पंक्तियाँ :
जो 'सर्वशः' इंद्रियाँ, अंदर खींच लेता,
आत्मज्ञान के पथ पर, स्थिर हो जाता; ⛰️
स्थिरबुद्धि उसीको, कहते हैं श्रीहरि,
वह मुक्ति का श्रेय, पाता है निश्चित ही. 🕉�

भावार्थ:
जो पुरुष अपनी इंद्रियों को विषयों से पूरी तरह खींच लेता है, वही आत्मज्ञान के मार्ग पर स्थिर रहता है। श्रीकृष्ण उसे ही "स्थितप्रज्ञ" कहते हैं, और वही सच्चा मुक्ति-प्राप्त होता है।

✨ Emoji सारांश (Emoji Summary)

🐢 ➡️ 👁�👂👃👅✋ (इंद्रियाँ) ➡️ 🚫🍎🍷💰 (विषयों से दूर)
AND 🔒 (संयम और नियंत्रण) ➡️ स्थिर मन 🧘�♂️ ➡️ प्रज्ञा प्रतिष्ठिता (बुद्धि स्थिर) ✨

🕉� सार-संदेश:
यह श्लोक और यह कविता हमें सिखाती है कि आत्मज्ञान पाने के लिए इंद्रिय-नियंत्रण अनिवार्य है। जब मनुष्य कछुए की भाँति अपनी इंद्रियों को संयमित करता है, तब उसका मन शांत और बुद्धि आत्मा में स्थिर होती है — यही स्थितप्रज्ञता है। 🌸

--अतुल परब
--दिनांक-23.10.2025-गुरुवार.
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