संत सेना महाराज- "कान्हा, मनगट माझे सोड तू जगज्जीवना-'प्रेम का हठ'-🔗💖✋💔🚫🤝

Started by Atul Kaviraje, October 24, 2025, 10:47:56 AM

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Atul Kaviraje

        संत सेना महाराज-

     "कान्हा, मनगट माझे सोड  तू जगज्जीवना।

     तुला शोभेना। वाईट तुझी ही खोड।

     मी गरीबाची। तू थोरांचा।

     तुझी माजी नाही जोड।"

📜 संत सेना महाराज अभंग - 'कान्हा, मनगट माझे सोड'

अभंग का संक्षिप्त अर्थ:

हे कान्हा, हे जग को जीवन देने वाले! मेरा हाथ (कलाई) छोड़ दो।
तुम्हारी यह आदत (पीछा करना) तुम्हें शोभा नहीं देती, यह अच्छी नहीं है।
मैं एक गरीब (दीन) हूँ और तुम महान हो।
इसलिए, हम दोनों की कोई बराबरी (मेल) नहीं है।

दीर्घ हिंदी कविता - 'प्रेम का हठ'

(७ पद्यों का, ४ पंक्तियों का, लयबद्ध काव्य)

पद्य १ – प्रारम्भ और मनुहार

'कान्हा' कहकर, मैं पुकारूँ हूँ तुम्हें, जग-जीवन,
कलाई मेरी अब, छोड़ दो हे मधुसूदन;
तुम्हें शोभा नहीं देता, यह अटपटा व्यवहार,
यह आदत तुम्हारी, लगती है दुष्ट और बेकार. 😠

पद्य २ – दीनता का भाव

तुम तो हो महानों के महान, सारे जग के स्वामी,
मैं हूँ एक गरीब की, दीन और अल्पगामी; 😔
तुम और हम में, भला कैसी जोड़ हो सकती,
यह प्रेम की बराबरता, कैसे खड़ी हो सकती. 🚫🤝

पद्य ३ – प्रेम का बंधन

मैं कहती हूँ 'छोड़ दो', पर ये केवल है रूठना,
तुमसे विरह तो, क्षण भर भी नहीं सहना; 💔
हठ है मेरा तुमसे, तुम पास ही रहना,
इस प्रेम की डोर को, तुम कभी मत टूटने देना. 🔗

पद्य ४ – ईश्वर की महानता

तुम लक्ष्मीपति कहलाते, विट्ठल हो खड़े,
मेरी छोटी सी भक्ती के पीछे क्यों तुम पड़े;
तुम ज्ञान का सागर, मैं अज्ञान की काई,
मेरी दीनता ही तुम्हें, खींच मेरे पास लाई. 💖

पद्य ५ – शरणागति

मनगट पकड़ना, यह तुम्हारा प्रेम बन्धन है,
यह माया का नहीं, आनंद का स्पंदन है;
अब छोड़ना मत स्वामी, मेरी यह पुकार,
मैं शरण हूँ तुम्हारी, तुम ही हो आधार. 🙏

पद्य ६ – भक्ति का रहस्य

यह विनय ही मेरा, तुम्हे सबसे है प्रिय,
इसीलिए तुम्हारी गति, मेरे लिए है सहजनीय;
मैं हूँ एक नाई, पर मेरी भक्ती है अटूट,
प्रेम के सम्मुख, सारे बंधन हो जाते छूट. 🗝�

पद्य ७ – समापन

जब दीनता और प्रेम, दोनों का होता मेल,
तब संत सेना कहते, यह प्रभु का है खेल; 🫂
'छोड़ो' यह कहना तो, प्रेम की झूठी बात,
तुम ही मेरे जीवन, तुम ही हो मेरी जात. 🛤�

Emoji सारांश (Emoji Summary)

कान्हा (🙏) और भक्त सेना (💇�♂️) की प्रेमिल जुगलबंदी —

भक्त:
"कान्हा! मेरा हाथ छोड़ दो ✋💔!
तुम हो महान 👑, मैं हूँ गरीब 😔,
हमारी नहीं कोई जोड़ 🚫🤝,
यह व्यवहार तुम्हें शोभा नहीं देता! 🙅�♂️"

कान्हा: (मुस्कुराकर) 😊

भक्त का सच्चा मन:
"पर हे नाथ! तुम मत छोड़ना 🔗💖,
मैं तुम्हारे प्रेम में बँधी हूँ,
तुम ही मेरी राह, तुम ही मेरा मार्ग! 🛤�"

🌸 भावार्थ:
यह कविता संत सेना महाराज की भक्तिभावना, विनम्रता, और ईश्वर-प्रेम के अनोखे संवाद को दर्शाती है।
भक्त बाहर से कहता है — "कान्हा, मुझे छोड़ दो",
पर भीतर से उसका हृदय कहता है —
"कान्हा, मुझे कभी मत छोड़ना!" 💞

--अतुल परब
--दिनांक-23.10.2025-गुरुवार. 
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