"शुभ दोपहर, शुक्रवार मुबारक हो"🌿 “दोपहर की फुसफुसाहटें” कविता: “दोपहर की बातें

Started by Atul Kaviraje, October 25, 2025, 12:29:43 PM

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Atul Kaviraje

"शुभ दोपहर, शुक्रवार मुबारक हो"

धूप भरी दोपहर के लॉन पर किताब और धूप का चश्मा

🌿 "दोपहर की फुसफुसाहटें"

कविता: "दोपहर की बातें"

🕶� चरण १
मैंने किताब रखी घास पर,
धूप थी, हवा का हल्का असर.
चश्मा पास, काला और बड़ा,
शांति का पल, मन खुला पड़ा.

📖 चरण २
पन्ने हिलते हवा संग,
पेड़ों में जैसे गीतों का रंग.
हर शब्द एक दुनिया बने,
कहानियाँ दरवाज़े खोलें।

🌼 चरण ३
घास सुनहरी, नीला गगन,
विचार हल्के, मन में सन्न.
प्रकृति भर दे आनंद से,
मन खो जाए सुंदरता में।

🌞 चरण ४
मैं पीछे झुका, धूप बदन पर,
बाहर गर्मी, भीतर सुख भर.
न कोई शोर, न कोई जल्दबाज़ी,
दोपहर थी साफ़ और प्यारी।

🌳 चरण ५
एक पक्षी उड़ा, छाया डाली,
उसके पंख जैसे कविता की लहरें.
मुस्काया, पन्ना पलटा,
किताब और आकाश बना मंच।

🪶 चरण ६
चश्मे में चमकी सुनहरी रोशनी,
सपनों की झलक, चमकती सी.
आँखों ने देखा दिन, रंगों में डूबा,
अद्भुत सा क्षण।

📚 चरण ७
किताब बंद, सूरज ढला,
अंतिम किरणों ने चमक बिखेरी.
खड़ा हुआ, मन संतुष्ट,
एक सुंदर दिन, शांति में समाप्त।

--अतुल परब
--दिनांक-24.10.2025-शुक्रवार.
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