📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-६०-‘इंद्रियों का महाबल’

Started by Atul Kaviraje, October 26, 2025, 10:17:32 PM

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Atul Kaviraje

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-६०-

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ २‑६०॥

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २ : सांख्ययोग - श्लोक ६०
कविता का शीर्षक: 'इंद्रियों का महाबल'

श्लोक :

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ २-६०॥

हिंदी कविता 🪔


हे कौन्तेय! सुनो यह गहरा ज्ञान,।
इंद्रियों का बल नहीं है थोड़ा-सा मान।
जो पुरुष ज्ञानी है, विवेक को रखता साथ,।
उसका भी मन छीन लेती है ये बलवान घात।



'विपश्चितः' वह नर, जो यत्न सदा करता है,।
मन को रोकने का संकल्प हृदय में भरता है।
फिर भी रूप, रस, गंध, स्पर्श और ये ध्वनि,।
मन को खींच लाते हैं, बनके प्रबल अगुनी।



'यततो ह्यपि' यानी प्रयास करने पर भी,।
साधना में रत है, तपस्या करने पर भी।
जैसे ही विषय सामने आते हैं दिखकर,।
विचारों का शोर मचता है एकदम सन्न कर।



'इंद्रियाणि प्रमाथीनि' यानी मंथन करने वाली,।
मन की शांति को पल में भंग करने वाली।
ये हैं समुद्र के तूफ़ान जैसी उठती लहर,।
विवेक की नैया को करती हैं क्षण में बेघर।



'हरन्ति प्रसभं मनः' – बल से खींच लाती हैं,।
संयम की रस्सी हाथों से झट से छुड़ाती हैं।
जैसे कोई शिकारी हिरण को फँसा लेता,।
वैसे विषय मन को मोह में भर देता।



विश्वामित्र जैसे महायोगी का यह है दृष्टांत,।
तप भंग हुआ, लगी विषयों की तीखी तांत।
इसलिए, प्रयत्न और ज्ञान चाहे हो महान,।
चित्तवृत्ति चंचल है, आसक्ति होती न शांत।



अतः 'मत्पर' होकर प्रभु में ही लीन हो जाओ,।
परमात्मा से जोड़ने मन का तार मिलाओ।
इंद्रियों के बल से नहीं मिल सकती शांति,।
ईश्वर-शरण में ही स्थापित हो प्रज्ञा-क्रांति।

🌸 सारांश (Summary):
इंद्रियों का प्रवाह अत्यंत प्रबल है। विवेकी और साधक पुरुष भी उनके प्रभाव से विचलित हो सकता है। इसलिए केवल ज्ञान और प्रयास से नहीं, बल्कि प्रभु में सम्पूर्ण समर्पण द्वारा ही मन स्थिर होता है और शांति प्राप्त होती है।

🙏 ईश्वर-शरण ही है स्थिर बुद्धि का आधार!

--अतुल परब
--दिनांक-25.10.2025-शनिवार.
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