📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-६१-🌸 'स्थिर प्रज्ञा का आधार'

Started by Atul Kaviraje, October 26, 2025, 10:19:27 PM

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Atul Kaviraje

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-६१-

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ २‑६१॥

॥ श्रीमद्भगवद्गीता - श्लोक २-६१ पर आधारित दीर्घ हिंदी कविता ॥

📜 मूल श्लोक:
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ २-६१॥

छोटा अर्थ (Short Meaning):
उन सभी (इंद्रियों) को वश में करके, साधक को मुझमें (परमात्मा में) तत्पर (एकाग्र) होकर बैठना चाहिए। क्योंकि, जिसकी इंद्रियाँ वास्तव में पूर्ण रूप से उसके वश में होती हैं, उसी की बुद्धि (प्रज्ञा) स्थिर हो जाती है।

🌸 'स्थिर प्रज्ञा का आधार' 🌸

कडवे (Stanza) – कविता (Poem)
कडवे १: प्रारंभ

(१) ये इंद्रियाँ हैं चंचल, विषयों पर ललचायें,
(२) मन को भी खींचकर, गड्ढे में ले जायें।
(३) इसलिए, हे अर्जुन! तुम यह रहस्य जान लो,
(४) पहले इन सब पर तुम, नियंत्रण ठान लो।

कडवे २: संयम

(५) तानि सर्वाणि संयम्य, भीतर इन्हें मोड़ो,
(६) कछुए-सम अवयव को, कवच में तुम जोड़ो।
(७) आँख, कान, जीभ और त्वचा को भी रोको,
(८) इंद्रियों के स्वामी बनो, विषयों पर न झोको।

कडवे ३: मत्परता

(९) जब इंद्रियाँ हों वश में, चित्त को तब शांत करो,
(१०) युक्त आसीत मत्परः, मुझमें ही ध्यान धरो।
(११) खाली मन को तुम, एक आधार दो,
(१२) प्रभु की भक्ति का, शुभ विचार दो।

कडवे ४: स्थिरता का प्रमाण

(१३) वशे हि यस्येन्द्रियाणि, जिसका है ये प्रमाण,
(१४) इंद्रियों पर जिसका, पूर्ण रूप से है मान।
(१५) मन-बुद्धि उसकी, न कहीं भी डोलती है,
(१६) सत्य ज्ञान की वाणी, तभी वह बोलती है।

कडवे ५: प्रज्ञा की प्रतिष्ठा

(१७) तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता, अटल उसका ज्ञान,
(१८) सुख-दुःख, लाभ-हानि में रखता सम-सम्मान।
(१९) विषयों के आकर्षण से, जो तनिक न डिगता है,
(२०) वास्तव में वही, आत्मज्ञान में जगता है।

कडवे ६: सारांश

(२१) संयम है प्रथम सीढ़ी, भक्ति है आधार,
(२२) बिना प्रभु-निष्ठा के, व्यर्थ है सारा विचार।
(२३) इंद्रियों को वश करके, जब प्रभु से जुड़ जाता है,
(२४) तभी तो योगी, परम शांति पाता है।

कडवे ७: निष्कर्ष

(२५) संयम का साधन, 'मत्पर' है परम धाम,
(२६) इनसे ही मिलती है, प्रज्ञा को विश्राम।
(२७) इंद्रिय-विजयी ही, स्थितप्रज्ञ कहलाता है,
(२८) मुक्ति के मार्ग पर, वही तो चल पाता है।

--अतुल परब
--दिनांक-26.10.2025-रविवार.
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