संत सेना महाराज-“स तु बाल्यं समारभ्य साधुसेवापरायणः।-😥🛐👶🙏

Started by Atul Kaviraje, October 28, 2025, 11:12:23 AM

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Atul Kaviraje

        संत सेना महाराज-

     "स तु बाल्यं समारभ्य साधुसेवापरायणः।

     सेनो लब्ध्वा धनं सर्व दीनेभ्यश्च ददौरूद्रा॥"

मूल अभंग: "स तु बाल्यं समारभ्य साधुसेवापरायणः। सेनो लब्ध्वा धनं सर्व दीनेभ्यश्च ददौरूद्रा॥"

पद १ : बाल्यावस्था और भक्ति का आरंभ 👶🙏

बालपन से ही सेना, भक्ति मार्ग पर चल दिए,
संतों की सेवा में उन्होंने अपना समय दिया;
संसार के मोह में वे कभी नहीं गए,
विठुराया के नाम में ही उन्होंने आनंद पाया।

पद २ : साधुसेवा और समर्पण 🧘�♀️💖

साधुओं की सेवा करना, यही उनका व्रत था,
उनके चरणों की धूल, उनका सौभाग्य था;
हर साधु में उन्हें पांडुरंग दिखते थे,
निःस्वार्थ भाव से सेवा, यही उनकी इच्छा थी।

पद ३ : निष्ठा और कर्मयोग ✂️💰

नाई (केशकर्तन) का काम उन्होंने ईमानदारी से किया,
कर्म में ही भक्ति का मार्ग उन्होंने खोजा;
जिस-जिस समय धन उनके हाथ आया,
उसे केवल सेवा का साधन माना।

पद ४ : धन का त्याग और दानशीलता 🎁🤲

सब धन प्राप्त करके, उनकी दानवृत्ति महान थी,
ज़रूरतमंदों के लिए उनका हाथ बार-बार उठा;
सारी संपत्ति उन्होंने गरीबों को समर्पित कर दी,
अपने लिए कुछ भी बचाकर न रखा।

पद ५ : दीनों की सेवा, ईश्वर की पूजा 😥🛐

गरीबों और दुखियों के लिए उनका हृदय पिघल जाता था,
उनके दुःख में उन्हें भगवान का दुःख दिखता था;
दीनों की सेवा ही सच्ची ईश्वर की पूजा है,
इसी में उन्हें मोक्ष की राह मिली।

पद ६ : उदाहरण का महत्व 👑✨

जब विट्ठल जी आए सेना जी का रूप लेकर,
राजा की सेवा की, धन दिया प्रेम से भरकर;
सेना जी ने वह धन भी गरीबों में बाँट दिया,
सेवा और त्याग का जीवंत रूप दिखला दिया।

पद ७ : निष्कर्ष और प्रेरणा 🌟💡

यही संदेश सेना जी ने जगत को दिया,
त्याग और भक्ति का आदर्श उन्होंने रचा;
बालपन से ही साधुओं के संग में रहे,
सेना ने सब धन पाकर, गरीबों को दान कर दिया!

--अतुल परब
--दिनांक-27.10.2025-सोमवार. 
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