श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-६४-राग-द्वेषमुक्ति-❌❤️😡

Started by Atul Kaviraje, October 30, 2025, 10:39:19 AM

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Atul Kaviraje

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-६४-

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ २‑६४॥

📜 भगवद्गीता सार-काव्य: राग-द्वेषमुक्ति (अध्याय २, श्लोक ६४)
श्लोक :

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।

आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ २-६४॥
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ २-६४॥

⭐ श्लोक का संक्षिप्त अर्थ (Meaning) :
राग और द्वेष से मुक्त,
तथा आत्मा (मन) के नियंत्रण में स्थित इन्द्रियों द्वारा
विषयों का सेवन करने वाला पुरुष ही
परम शांति (प्रसन्नता) को प्राप्त करता है।

🌻 ७ कडवों की हिंदी कविता: शांति का मार्ग

कडवा १: मन-नियंत्रण का सूत्र 🧘

मन जिसका हो गया पूर्ण वश,
इन्द्रियों को न रहा कोई लालच।
विधेयात्मा है वही सच्चा साधक,
जिसके हाथ में जीवन का चालक।

(अर्थ: विधेयात्मा = जिसने अपने मन को वश में कर लिया है।)

कडवा २: इन्द्रियों का विचरण 👁�👂

आँखें देखती रूप और रंग,
कान सुनते भांति-भांति की तरंग।
इन्द्रियाँ विषयों में विचरण करतीं,
पर मन अंदर से तटस्थ रहती।

(अर्थ: इंद्रिये विषयानिन्द्रियैश्चरन् = इन्द्रियाँ विषयों में घूमती हैं।)

कडवा ३: राग और द्वेष ❌❤️😡

राग का अर्थ है लोभ-आसक्ति,
द्वेष का अर्थ है शत्रुता-विरक्ति।
इन दोनों दोषों से जो हो मुक्त,
वही साधक है सच्चा वियुक्त।

(अर्थ: रागद्वेषवियुक्तैस्तु = राग (आसक्ति) और द्वेष (नफरत) से मुक्त।)

कडवा ४: अनासक्ति की परिभाषा 🕊�

मिलने पर हर्ष नहीं,
खो जाने पर क्लेश नहीं।
यही है अनासक्ति की सच्ची पहचान,
मन में न हो किसी का भी गुमान।

(यह कडवा 'रागद्वेषवियुक्त' स्थिति को समझाता है।)

कडवा ५: प्रसन्नता की प्राप्ति ✨

ऐसे शुद्ध चित्त में होता वास,
शाश्वत, निर्मल और सच्ची प्रसन्नता खास।
बाहर हो तूफान, तो भी अंदर शांति,
यही है जीवन की परम भ्रांति।

(अर्थ: प्रसादमधिगच्छति = शांति (प्रसन्नता) को प्राप्त करता है।)

कडवा ६: उदाहरण सहित बोध 🍲

उदाहरण: जैसे कमल-पत्ता जल में,
वैसे ही संसारी रहे अपने बल में।
मीठा खाए पर आसक्त न हो,
कड़वा छोड़े पर द्वेष न हो।

(यह कडवा उदाहरण द्वारा अनासक्ति समझाता है।)

कडवा ७: निष्कर्ष का संदेश 🔑

विषयों का भोग हो केवल साधन,
वे न बनें बंधन का कारण।
मन को शांत रखना ही अंतिम सार,
यही है गीता का सरल विचार।

✨ || श्रीमद्भगवद्गीता सार-काव्य समाप्त || ✨

--अतुल परब
--दिनांक-29.10.2025-बुधवार.
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