📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-65-श्रीकृष्ण का ‘प्रसाद’ 🌿🙏

Started by Atul Kaviraje, October 31, 2025, 10:55:22 AM

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Atul Kaviraje

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-65-

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।65।।

📜 श्रीकृष्ण का 'प्रसाद' (शांत मन) 🌿🙏

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक ६५ प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।६५।।

श्लोक का संक्षिप्त अर्थ (Short Meaning in Hindi)
मन की प्रसन्नता (प्रसाद) प्राप्त होने पर साधक के सभी दुःखों का नाश होता है। ऐसे प्रसन्न मन वाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही परमात्मा में स्थिर हो जाती है।

दीर्घ हिन्दी कविता (भक्तिभावपूर्ण) - ७ पद 🌸

📜 श्रीकृष्ण का 'प्रसाद' (शांत चित्त) 🌿🙏

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २ : सांख्ययोग - श्लोक ६५

श्लोक :
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।६५।।

श्लोक का संक्षिप्त अर्थ (Short Meaning)
जब साधक को अंतःकरण की प्रसन्नता (प्रसाद) प्राप्त होती है, तब उसके सभी दुःखों का नाश हो जाता है।
ऐसे प्रसन्न मन (शांत चित्त) वाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही परमात्मा में स्थिर हो जाती है।

🌸 दीर्घ हिन्दी कविता (भक्तिभावपूर्ण) - ७ कडवे
१. आरंभ : भक्ति का मार्ग

मन की शांति ही है सच्चा योग,
जीवात्मा को मिले सुंदर भोग।
प्रसाद है यह प्रभु का अनुपम दान,
सारे दुःख मिटाए, यह ही सच्चा मान ।।
(प्रसादः भगवान की कृपा से मिली मन की शांति)

२. दुःखों का मूल और क्षय

संकटों के पर्वत चाहे आएं,
चिंता, भय सब दूर भाग जाएं।
सर्वदुःखानां हानिरस्य यही है वचन,
जब शांत चित्त में होता है वास और मन ।।
(सर्वदुःखानां हानिरस्यः उसके सभी दुःखों का नाश होता है)

३. चित्त की प्रसन्नता

राग-द्वेष की मिट गई परछाई,
विषयों में होकर भी नहीं भरमाई।
जब साधक बनता है प्रसन्नचेतस,
तभी मिलती है मोक्ष की सच्ची लगन ।।
(प्रसन्नचेतसः जिसका मन अत्यंत शांत, आनंदित और प्रसन्न हो गया है)

४. बुद्धि का स्थिर ठिकाना

भटकी हुई बुद्धि, चंचल यह मन,
संसार में करता रोज़ यह नर्तन।
शांत चित्त से इसकी शुद्धि हो जाए,
परमात्मा से बुद्धि अविचल लग जाए ।।
(बुद्धिः निर्णय लेने की शक्ति)

५. शीघ्र स्थिरता (तत्परता)

प्रसन्नता आते ही देर न लगती,
तटस्थता की ज्योति तुरंत जगती।
ह्याशु पर्यवतिष्ठते यही है प्रेम,
बुद्धि आत्मस्वरूप में ले शीघ्र विश्राम ।।
(ह्याशु पर्यवतिष्ठतेः तुरंत (शीघ्र) स्थिर हो जाती है)

६. जीवनमुक्ति का रहस्य

जिसको मिला यह अंतरंग प्रसाद,
उसके जीवन में न हो कोई विवाद।
स्थिर बुद्धि से देखता जग को सारा,
मुक्त होकर वह रहता सबसे न्यारा ।।
(न्याराः अलग/विरक्त)

७. निष्कर्ष : प्रार्थना और समर्पण

हे कृष्ण! हमें भी देना यह प्रसाद,
न हो विषयों का कोई भी नाद।
बुद्धि सदा रहे आपके चरणों में लीन,
प्रसन्न चित्त से यह प्रार्थना, हो अधीन ।।
(अधीनः समर्पित)

✨ समाप्त – "शांत चित्त का प्रसाद" यही श्रीकृष्ण का अमूल्य वरदान है। 🌼

--अतुल परब
--दिनांक-30.10.2025-गुरुवार.
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