📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-66-🌸 अशांत मन का अन्वेषण-

Started by Atul Kaviraje, November 01, 2025, 10:45:14 AM

Previous topic - Next topic

Atul Kaviraje

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-66-

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।।66।।

🌸 अशांत मन का अन्वेषण
(श्लोक ६६ पर आधारित हिंदी कविता)

🧘 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २ : सांख्ययोग - श्लोक ६६

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।। ६६।।

📜 हिंदी कविता (७ कड़ियाँ)

१. (प्रारम्भ)

जिसका मन नहीं है स्थिर, इन्द्रियों में फँसा सदा,
उस अयुक्त को कैसे, मिले स्थिर बुद्धा भला?
विचारों का बवंडर, उठे चित्त में गहरा घोर,
सत्य की राह उसे, मिले न तनिक भी छोर।

अर्थ:
वह मनुष्य जिसका मन स्थिर नहीं है और जो हमेशा इन्द्रिय-विषयों में उलझा रहता है,
उसे स्थिर और निश्चयात्मक बुद्धि कैसे प्राप्त होगी?
उसके मन में विचारों का भयंकर तूफान उठता रहता है,
इसलिए उसे सत्य क्या है, इसकी दिशा तनिक भी नहीं मिल पाती।

२. (बुद्धि और नियंत्रण)

नियंत्रण जिसका नहीं, इन्द्रियों पर लेश मात्र भी,
उसे अयुक्त कहना, यही गीता की है बात सच्ची!
व्यभिचारी बुद्धि उसकी, पल-पल में मुड़ जाती,
सही निर्णय लेने में, वह हमेशा चूक जाता ही!

अर्थ:
जिसका इन्द्रियों पर ज़रा सा भी नियंत्रण नहीं है,
उसे ही गीता में 'अयुक्त' (योग में स्थिर नहीं) कहा गया है।
ऐसे मनुष्य की बुद्धि स्थिर नहीं रहती, वह हर पल बदलती रहती है।
इसलिए सही निर्णय लेने में वह हमेशा गलती कर बैठता है।

३. (भावना का अभाव)

'भावना' का अर्थ है, आत्म-चिंतन जानो तुम बस यही,
अयुक्त को यह चिंतन, मिले कैसे कहो कभी भी?
संसार में उलझा हुआ, चित्त उसका अशुद्ध होता,
परमार्थ की चाह, कभी नहीं होती, वह बस सोता रहता!

अर्थ:
'भावना' का अर्थ है आत्म-तत्त्व का चिंतन या शुद्ध विचार रखना।
इन्द्रिय-विषयों में फँसे हुए अयुक्त व्यक्ति को यह आत्म-चिंतन कैसे प्राप्त हो सकता है?
उसका मन संसार की आसक्तियों में लिप्त रहता है,
इसलिए उसे परमार्थ और ईश्वर के प्रति कोई चाहत नहीं होती।

४. (शांति का स्रोत)

चित्त में आत्म की, धारणा नसे जिसकी भी,
शांति की आशा उससे, बहुत दूर रहती हमेशा ही,
इच्छाओं के फेरों से, कभी न मुक्त हो पाता,
आत्म-चिंतन के बिना, शांति कभी नहीं मिल पाती उसे।

अर्थ:
जिसके मन में आत्म-तत्त्व का चिंतन करने की वृत्ति नहीं होती,
उसके लिए शांति की उम्मीद बहुत दूर होती है।
वह निरंतर इच्छाओं और अपेक्षाओं के चक्र में फँसा रहता है।
आत्म-चिंतन के अभाव में उसे आंतरिक शांति कभी प्राप्त नहीं हो सकती।

५. (सुख की परिभाषा)

अशांत जिसका मन, पीड़ा में वह जल रहा है,
उस अशांत को सुख, कहाँ से फिर मिलता है?
चाहे भोगे सब सुख, दौलत का हो ढेर भी,
अंदर आग जलती है, शांति बिना हर बार ही!

अर्थ:
जिसका मन अशांत है, वह हमेशा दुख और बेचैनी में जलता रहता है।
उस अशांत मनुष्य को वास्तविक सुख कहाँ से मिलेगा?
भले ही वह दुनिया के सारे सुखों और धन-संपत्ति का उपभोग करे,
परंतु उसके अंदर शांति का अभाव होने के कारण दुख की आग जलती रहती है।

६. (उपदेश सार)

इसलिए 'युक्त' होना, यही सच्चा योग कहलाए,
इन्द्रियों को वश करना, साधा यही उपाय सुहाए!
आत्मा से जोड़कर, बुद्धि स्थिर करनी चाहिए,
तभी शांति के, फल चखने को मिलते हैं यही!

अर्थ:
इसलिए, मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखकर 'युक्त' (योग में स्थिर) होना ही सच्चा योग है।
इन्द्रियों को वश में करना ही आत्मिक साधना का सरल उपाय है।
जब हम अपनी बुद्धि को आत्म-तत्त्व से जोड़कर स्थिर करते हैं,
तभी हमें सच्ची शांति का अनुभव होता है।

७. (भक्तिभाव)

हे कृष्णा! तेरे चरणों में, अर्पण बुद्धि सारी कर दूँ,
मन मेरा शांत रखना, मिटा दे अंधेरी झाड़ी हर दम,
शांति का सुख दे दे, यही मेरी है प्रार्थना अब,
तू ही आधार हमारा, तू ही सारा जग नभ तब!

अर्थ:
हे कृष्णा! मैं अपनी संपूर्ण बुद्धि आपके चरणों में समर्पित करता हूँ।
मेरे मन को शांत रखिए और मेरे भीतर के अज्ञान का अंधकार दूर कीजिए।
मुझे शांति का सच्चा सुख दीजिए, यही मेरी आपसे प्रार्थना है।
आप ही हमारा एकमात्र सहारा हैं और आप ही इस पूरे संसार के नियंता हैं।

✅ यह संपूर्ण कविता "अशांत मन का अन्वेषण"
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक ६६ (अध्याय २ – सांख्ययोग) के भावों पर आधारित है।
यह मानव मन की चंचलता, बुद्धि की अस्थिरता और शांति की खोज का
सुगठित काव्य-रूप में आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

--अतुल परब
--दिनांक-31.10.2025-शुक्रवार
===========================================