संत सेना महाराज-“एका स्वधर्म विचार। धंदा करी दोन प्रहर-कर्म-भक्ति का सुंदर मेल-

Started by Atul Kaviraje, November 01, 2025, 10:50:50 AM

Previous topic - Next topic

Atul Kaviraje

संत सेना महाराज-

     "एका स्वधर्म विचार। धंदा करी दोन प्रहर ।

     सांगितले साचार। पुराणान्तरी ऐसे हैं ॥

     करुनिया स्नान। मुखी जपे नारायण।

     मागुती न जाण। शिवू नये धोकटी ॥"

💈 कर्म और भक्ति का सुंदर मेल 🕉�

(संत सेना महाराज के अभंग पर आधारित - भक्तिभावपूर्ण हिंदी कविता)

१. (प्रारंभ: जीवन की दिशा)

संसार की राहों पर, सभी दौड़ते हैं सदा।
स्वधर्म का विचार, मन में रखना है शुद्धा।
संत सेना कहते हैं, यही जीवन का सार है।
कमाना पेट भर का, मत रखो लोभ अपार है!

अर्थ: संसार के मार्ग पर सभी लोग दौड़ रहे हैं, पर हमें अपने कर्तव्य (स्वधर्म) का विचार मन में शुद्ध रखना चाहिए। संत सेना महाराज कहते हैं कि, जीवन का सार यही है कि पेट भरने लायक कमाओ और अत्यधिक लालच मत करो।

२. (सीमित कर्म)

व्यवसाय करो दो पहर, समय निश्चित कर लो तुम।
उदर-निर्वाह जितना, कर्म सीमित ही रख लो तुम!
पुराणों का यह कहना, है यह परम सत्य जानो।
शेष समय धर्म-भक्ति, को देना नित्य मानो!

अर्थ: केवल दो प्रहर (लगभग छह घंटे) अपना व्यवसाय करो, और आजीविका के लिए काम सीमित रखो। पुराणों का यह कहना परम सत्य है। बचा हुआ सारा समय नित्य ही धर्म और भक्ति के लिए रखना चाहिए।

३. (शुद्धि और नामस्मरण)

कर स्नान सुबह-सवेरे, तन मन होता शुद्ध है।
फिर मुख से जपो नारायण, भक्ति में मन रुद्ध है!
वह विट्ठल पांडुरंग, है जीव का सच्चा मीत वही।
उसके नाम का सहारा, जगत में मुक्ति देता भी!

अर्थ: सुबह स्नान करने से शरीर और मन शुद्ध हो जाता है। फिर मुख से 'नारायण' नाम का जप करना चाहिए, ताकि मन भक्ति में स्थिर हो जाए। वह विट्ठल-पांडुरंग ही हमारे जीवन का सच्चा साथी है; उसके नामस्मरण के आधार पर ही इस जगत में मुक्ति मिलती है।

४. (धोकटी को न छूना)

फिर दोबारा मत जानो, धोकटी (व्यावसायिक साधनों) को नहीं छूना तुम।
काम खत्म हो जब भी, मन को भटकने मत देना तुम!
व्यवसाय का बंधन, तत्काल छोड़ देना चाहिए।
नामस्मरण के रस में, फिर शांत ही रहना चाहिए!

अर्थ: काम समाप्त होने पर फिर से अपने व्यवसाय के साधनों को स्पर्श न करें। जब काम खत्म हो जाए, तो मन को फिर से उस काम में भटकने न दें। व्यवसाय के बंधन को तुरंत छोड़ देना चाहिए और नामस्मरण के आनंद में शांत रहना चाहिए।

५. (लालच पर नियंत्रण)

यह लालच मन में भरता है, मन होता चंचल इससे।
परमार्थ की चाहत, तभी होती निर्मल फिर कैसे?
धन के पीछे भागना, कभी तो रुकना चाहिए।
जीवन की सार्थकता, हरी नाम में देखना चाहिए!

अर्थ: लालच से मन में हलचल मचती है, मन चंचल हो जाता है। परमार्थ की इच्छा तभी शुद्ध होती है, जब लालच पर नियंत्रण हो। धन के पीछे भागना कभी तो रोकना चाहिए और जीवन की सच्ची सार्थकता भगवान के नामस्मरण में देखनी चाहिए।

६. (कर्म और भक्ति का समन्वय)

यह कर्मयोग ही है, संसार में रहना तो है ज़रूरी भले।
मन का ध्यान होना चाहिए, विट्ठल की ओर हर पल!
व्यवसाय से शरीर पले, नाम से आत्मा शांत होती है।
सेना कहें: ओ मानव, मुक्ति फिर दूर नहीं होती है!

अर्थ: यह कर्मयोग है, जिसका अर्थ है संसार में रहते हुए भी, मन का ध्यान विट्ठल की ओर (परमार्थ) होना चाहिए। व्यवसाय से शरीर का पोषण होता है, लेकिन नामस्मरण से आत्मा को शांति मिलती है। संत सेना महाराज कहते हैं: हे मानव, जब तुम यह समन्वय साधोगे, तो मोक्ष दूर नहीं है।

७. (निष्कर्ष: समर्पण भाव)

दो पहर काम करो, शेष समय हरी को दे दो तुम।
नामस्मरण के प्रकाश में, जीवा शांति आए तुम में अब!
अपनी धोकटी को भी, सेवा मानकर करो तुम अर्पण ही।
हे विट्ठला! अपने चरणों में, हमें रखना स्थिर हर पल ही!

अर्थ: दो प्रहर काम करो और बचा हुआ समय भगवान को समर्पित कर दो। नामस्मरण के प्रकाश से तुम्हारी आत्मा को शांति मिलेगी। अपने व्यवसाय को भी भगवान की सेवा मानकर करो। हे विट्ठला! हमें अपने चरणों में हमेशा स्थिर रखना।

✅ पूरा सारांश (संत सेना की शिक्षा का निचोड़):
स्वधर्म का पालन → सीमित कर्म → नामस्मरण → आंतरिक शांति → मोक्ष प्राप्ति।

--अतुल परब
--दिनांक-31.10.2025-शुक्रवार.
===========================================